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  • Pages: 103p
  • Year: 2003
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 10: 8126706309
  •  
    बेहद सहज और सरल ढंग से किस्सागोई की शैली में लिखा गया यह उपन्यास बंगाली समाज के स्वभाव और चरित्र का सच्चा एवं प्रामाणिक चित्र उपस्थित करता है । महानगरीय जीवन की भागमभाग और गहमागहमी से ऊबी–थकी अविवाहित कामकाजी युवती, अरा, जब अपनी बड़ी बहन स्मृति के घर बिलासपुर छुट्टियाँ बिताने पहुँचती है तो उसके सामने धीरे–धीरे जीवन का सर्वथा नया अर्थ खुलता चला जाता है । उसके अभावग्रस्त एकाकी जीवन की थकान दूर होती है और वह जीवन–राग एवं प्रकृति–राग से लबरेज तरोताजा होकर कलकत्ता लौटती है । हर जीवन महाजीवन है और ढोने के लिए नहीं, जीने के लिए हैµजीवन का यह पाठ अरा को प्रकृति से समृद्ध आदिवासी अंचल छत्तीसगढ़ की गोद में बसे विलासपुर में मिलता है । महानगरीय जीवन–बोध और प्रकृत आदिवासी जीवन–बोध की टकराहट की अनुगूँज लिए यह छोटी–सी औपन्यासिक कृति एक सूने सितार के तार छेड़ने की तरह है । यह सितार है ‘अरा’ जिसके तार छेड़ता है ‘परदेसिया’ और जिसकी झंकृति पाठक के दिलो–दिमाग में देर–देर तक, दूर–दूर तक बनी रहती है । बांग्ला के अग्रिम पंक्ति के कथाकार बुद्धदेव गुहा ने अपनी व्यापक यात्राओं के दौरान पहाड़ों, जंगलों और नदियों को काफी नजदीक एवं आत्मीयता के साथ देखा है और अपनी रचनाओं के जरिए पाठकों में प्रकृति से प्रेम करने की ललक जगाई है । उनके साहित्य में स्त्री– पुरुष प्रेम से लेकर जनसाधारण तक के प्रति रागात्मक संबंधों का विस्तार देखा जा सकता है । यह उपन्यास एक बार फिर इस बात की पुष्टि करता है ।

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    Budhadev Guha

    जन्म: 29 जून, 1935 ई.। बांग्ला के शीर्ष कथाकारों में एक। बांग्ला पाठकों के बीच संप्रति सर्वाधिक लोकप्रिय उपन्यासकार।

    शिक्षा: आरंभिक पढ़ाई-लिखाई अविभाजित बंगाल के रंगपुर और बड़िशाल में, जो अब बांग्लादेश में हैं। कोलकाता के सेंट जेवियर्स कॉलेज से उच्च शिक्षा।

    रचनाएँ: अब तक शताधिक उपन्यास, कथा संकलन एवं अन्य कृतियाँ प्रकाशित। इनमें ‘कोजागर’, ‘कोइल तीरे’, ‘अदल-बदल’, ‘मधुकरी’, ‘लंगड़ा पाहन’, ‘धूलो- बाली’, ‘चबूतरा’, ‘खेला जखोन’, ‘सविनय निवेदन’, ‘स्वगोक्ति’, ‘अभिलाष’, ‘प्रथम प्रवास’, ‘भोरेर आगे’, ‘हलुद बसंत’, ‘बनबीविर बने’, ‘निनी कुमारीर बाघ’, ‘पंचम प्रवास’, ‘जेठू मनी एंड कंपनी’, ‘हजार दुआरी’, ‘नग्न निर्जन/बाती घर’, ‘पंच प्रदीप’, ‘संधेर परे’ आदि विशेष उल्लेखनीय हैं।

    सम्मान: बांग्ला साहित्य जगत में सर्वाधिक प्रतिष्ठित ‘आनंद पुरस्कार’ समेत ‘शरत् पुरस्कार’, ‘विभूतिभूषण पुरस्कार’ एवं ‘शिरोमणि पुरस्कार’ आदि से सम्मानित। एक उपन्यास डॉ. जॉन विलियम हूड द्वारा अंग्रेजी में और कुछ कृतियाँ अन्यान्य भारतीय भाषाओं में अनूदित।

    वृत्ति: पेशे से एकाउंटेंट, इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया के फेलो हैं। पश्चिम बंगाल सरकार के वन विभाग के अधीन वन्य जीवन सलाहकार बोर्ड के सदस्य, पश्चिम बंगाल पर्यटन विकास निगम के निदेशक, सांस्कृतिक केंद्र ‘नंदन’ के सलाहकार बोर्ड के सदस्य, शांतिनिकेतन स्थित विश्वभारती वि.वि. के रवीन्द्र भवन की प्रबंध समिति के सदस्य के रूप में दायित्व निर्वाह। रवीन्द्र संगीत के गहरे जानकार: आकाशवाणी कलकत्ता के रवीन्द्र संगीत आडिशन बोर्ड में पाँच साल तक रहे। श्री गुहा प्रतिभाशाली गायक व चित्रकार भी हैं। अब तक बांग्ला पुरातनी गान के दो कैसेट और पेंटिंग्स का एक एलबम जारी हो चुके हैं।

     

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