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Philhal

Philhal

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  • Pages: 162p
  • Year: 2007
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9788126713684
  •  
    ‘युवा लेखकों के विचार-विरोध और उ$ब या अबौद्धिकता का एक और पक्ष कविता में इधर बढ़ी सपाटबयानी से भी जुड़ा हुआ है। नई कविता में बिंबों और प्रतीकों की ऐसी भरमार हो गई थी कि कविता शब्दाडंबर होने लगी थी और उसकी अनुभवात्मक तात्कालिकता नष्ट-सी हो गई थी। कविता को फिर जीवित तात्कालिकता देने के लिए और काव्य-भाषा को, जो बिंबों में फँसकर गतिहीन और जड़ हो चुकी थी; ताजश्गी और जीवंतता देने के लिए, युवा कवियों ने अगर सपाटबयानी की ओर रुख किया तो यह स्वाभाविक और जरूरी ही था। लेकिन सपाटबयानी जल्दी ही सतही और यांत्रिक बखान का पर्याय बन गई है और समकालीन यथार्थ का बड़ा अबोध बयान उसके माध्यम से हो रहा है: इसकी तह में समझ को अनुभूति को नियंत्रित न करने देकर यथार्थ का कामचलाउ$ और निरा इंद्रिय-बोधी सरलीकरण करने की प्रवृत्ति भी कहीं न कहीं जश्रूर घर करती जान पड़ती है।’ ‘नए लेखक ने अपने बुनियादी लगावों को कैसे उनके व्यापक अर्थों तक ले जाने की कोशिश नहीं की, इसका एक दिलचस्प उदाहरण उपन्यास के प्रति उसकी उदासीनता है। कहानी के सुविधापूर्ण माध्यम को काफ़ी मानकर नए कथाकार ने आत्मतुष्टि अनुभव की। छोटे-छोटे अनुभवों को एक व्यापक धरातल पर सार्थक और व्यवस्थित दृष्टि से गँूथने और व्यक्ति-संबंधों को सामाजिक सचाई से जोड़कर उन्हें प्रासंगिकता और गहराई देने की कोशिश बहुत कम हुई है।’ ‘आज का सच्चा कवि अपने मानवीय होने के पूरे संश्लिष्ट अनुभवों को व्यक्त करना चाहता है - उसकी अभिव्यक्ति भी अनिवार्यतः संश्लिष्ट होती है। पहले, यानी मोटे तौर पर नई कविता के पहले, कविता की भाषा, रोजश्मर्रा के जीवन-कर्म की भाषा और ज्ञान के अनुशासनों की भाषा अलग-अलग थी - उनमें अंतर स्पष्ट था। अपने को संश्लिष्ट अनुभव को चरितार्थ करने में सक्षम बनाने के लिए कविता की भाषा ने स्वयं को अधिकाधिक दूसरे मानवीय कार्य-क्षेत्रों की भाषा से प्रतिकृत होने दिया है, इसलिए वह अधिक अर्थव्यापी भी है और उसमें निहित अनुगँूजें भी कई तरह की हैं।’ - इसी पुस्तक स

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    Ashok Vajpeyi

    1970 में अपने निबंध-संग्रह 'फ़िलहाल' से हिंदी में आलोचना-प्रवेश करनेवाले कवि-आलोचक अशोक वाजपेयी लगभग एक अधसदी से कविता, साहित्य, संस्कृति, संगीत, रूपंकर कलाओं आदि पर हिंदी और अंग्रेजी में आलोचना लिखते रहे हैं ! उन्होंने आलोचना की भाषा को नई ताजगी और सूक्ष्मता देने के साथ-साथ उसे सामाजिक संवाद का हिस्सा बनाने में सार्थक भूमिका निभाई है !

    उनकी प्रकाशित आलोचना पुस्तकों में 'फ़िलहाल', 'कुछ पूर्वग्रह', 'कविता का गल्प', 'सीढियां शुरू हो गई हैं', 'कभी-कभार', 'यहाँ से वहां' , 'कुछ खोजते हुए', 'पुनर्भव', 'समय से बाहर' आदि शामिल हैं !

    अशोक वाजपेयी को साहित्य अकादेमी पुरस्कार (जो उन्हें 1994 में मिला उसे बढती असहिष्णुता के विरोध में 2015 में लौटा दिया), दयावती मोदी कविशेखर सम्मान, कबीर सम्मान, समन्वय भाषा सम्मान आदि से अलंकृत किया गया है ! फ्रेंच और पोलिश सरकारों ने उन्हें उच्च नागरिक सम्मान दिए हैं ! 2011 में उन्होंने उत्तर प्रदेश सर्कार का भारत भारती पुरस्कार विरोधस्वरुप स्वीकार नहीं किया था !

    वे 35 वर्ष भारतीय प्रशासनिक सेवा में रहे ! महात्मा गाँधी अन्तराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के सस्थापक-कुलपति, केन्द्रीय ललित कला अकादेमी के अध्यक्ष रहे हैं और इन दिनों रजा फाउंडेशन के प्रबंध-न्यासी हैं ! वे भारत भवन न्यास के संस्थापक न्यासी सचिव और अध्यक्ष भी रहे हैं ! हिंदी आलोचना की पत्रिका 'पूर्वग्रह' का उन्होंने लगभग 16 वर्षों तक संपादन किया !

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