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Pragatiwad Aur Samanantar Sahitya

Pragatiwad Aur Samanantar Sahitya

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  • Pages: 332p
  • Year: 2012
  • Binding:  Paperback
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9788126722402
  •  
    यह पुस्तक शोधग्रंथ भी है और धारदार तर्क-वितर्क से भरी एक सृजनात्मक कृति भी है। इसमें प्रगतिशील आंदोलन के ऐतिहासिक विकास-क्रम, उसके दस्तावेजों, उसके रचनात्मक और समालोचनात्मक पहलुओं तथा उस दौर में प्रचलित समानांतर प्रवृत्तियों से उसके द्वंद्वात्मक रिश्ते की पड़ताल की गई है। यह पुस्तक शोध, अन्वेषण, स्रोत सामग्री की छानबीन पर आधारित ऐतिहासिक विवेचना के क्षेत्र में एक नये ढंग की प्रामाणिकता के कारण हिंदी के सभी प्रमुख समालोचकों के द्वारा सराही गई है तथा पाठक समुदाय ने इसका हार्दिक स्वागत किया है। अतः अध्यापकों, शोधार्थियों तथा नई पीढ़ी के साहित्यप्रेमी पाठकों के लिए यह प्रेरणादायी पठनीय पुस्तक है। 1930 से 1950 के साहित्यिक इतिहास के मुखर आईने के रूप में यह अद्वितीय आलोचनात्मक कृति है। पारदर्शी तार्किकता और सांस्कृतिक उत्ताप से भरपूर संवेदनशील मीमांसा के अपने गुणों के कारण रेखा अवस्थी की यह पुस्तक प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना के 75 वर्ष पूरा होने के मौके पर फिर से उपलब्ध कराई जा रही है क्योंकि पिछले दस सालों से यह पुस्तक बाजार में लाख ढूंढ़ने पर भी मिलती नहीं थी। इस तीसरे संस्करण की विशिष्टता यह है कि परिशिष्ट के अंतर्गत कुछ नये दस्तावेज भी जोड़े गए हैं। इस पुस्तक के पांच अध्यायों में इतनी भरपूर विवेचनात्मक सामग्री है कि यह पुस्तक बीसवीं सदी के हिंदी साहित्य के पूर्वार्द्ध का इतिहास गं्रथ बन जाने का गौरव प्राप्त कर चुकी है। सन् 2011 शमशेर, केदार, नागार्जुन, अज्ञेय, गोपाल सिंह नेपाली का जन्मशताब्दी वर्ष रहा है। इस पुस्तक में इन सभी के कृतित्व का मूल्यांकन तत्कालीन ऐतिहासिक संदर्भ में किया गया है। इसके साथ ही यह पुस्तक प्रगतिशील आंदोलन के बारे में फैलाई गई भ्रांतियों को तोड़ती है और दुराग्रहों पर पुनर्विचार करने के लिए विवश करती है।

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    Rekha Awasthi

    जन्म : 20 जून, 1947 को लालगंज, जिला : रायबरेली (उत्तर प्रदेश) में हुआ। दिल्ली विश्वविद्यालय से एम.ए. (हिन्दी), भाषा विज्ञान में डिप्लोमा तथा भागलपुर विश्वविद्यालय से पी-एच.डी. की उपाधि प्राप्त की। 1968 से 1973 तक केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय और गृहमंत्रालय के केन्द्रीय अनुवाद ब्यूरो में काम किया। दिल्ली विश्वविद्यालय के अनेक कालेजों में अस्थायी प्राध्यापक पद पर कार्य करने के बाद स्थायी रूप से दयाल सिंह कालेज प्रात: (दिल्ली विश्वविद्यालय) में अध्यापन करते हुए जून, 2012 में सेवानिवृत्त। साहित्यिक-सांस्कृतिक गतिविधियों और जन-आन्दोलनों में सक्रिय योगदान रहा है। फिलहाल जनवादी लेखक संघ की राष्ट्रीय सचिव और 'नया पथ’ के सम्पादक मंडल से सम्बद्ध।

    प्रकाशित पुस्तकें : प्रगतिवाद और समानान्तर साहित्य।

    सम्पादित : प्रेमचन्द : विगत महत्ता और वर्तमान अर्थवत्ता, श्रीलाल शुक्ल : जीवन ही जीवन, 1857 : इतिहास, कला साहित्य, 1857 : इतिहास और संस्कृति, 1857 : बगावत के दौर का इतिहास,  हिन्दू-उर्दू : साझा संस्कृति, फ़ैज़ की शायरी एक जुदा अन्दाज़ का जादू, फ़ैज़ की शख्सियत : अँधेरे में सुर्ख़ लौ, जाग उठे ख्‍़वाब कई (साहिर लुधियानवी की नज़्मों एवं गीतों का संग्रह)।

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