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Pratinidhi Shairy : Akbar Allahabadi

Pratinidhi Shairy : Akbar Allahabadi

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  • Pages: 183p
  • Year: 2004, 1st Ed.
  • Binding:  Paperback
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Radhakrishna Prakashan
  • ISBN 10: 8171197140
  •  
    1851 की जंगे–आजादी में हिंदस्तानियों की हार के बाद उर्दू अदब में शुरू होने वाले रेनासाँ में ‘अकबर’ इलाहाबादी का नाम सफे–अव्वल के शायरों में गिना जाता है । धर्म पर आधारित इस रेनासाँ की सारी विशेषताएँ ‘अकबर’ के यहाँ पूरी स्पष्टता के साथ देखी जा सकती हैं । ‘अकबर’ के कलाम की एक विशेषता और भी है । उन्होंने अपनी शायरी की शुरुआत संजीदा रवायती शायरी के साथ की थी । वही गुलो–बुलबुल, वही साग“रो–मीना, वही शीरीं–फ’रहाद, वही शमा और परवाना रवायती शायरी के सारे प्रतीक ‘अकबर’ की शुरुआती शायरी में नज“र आते हैं । लेकिन अकबर इसी रवायत पर कायम रहे होते तो तय है कि वे मामूली दर्जे के सैकड़ों शायरों में बस एक होते । लेकिन खुशनसीबी कि ऐसा नहीं हुआ । जल्द ही अकबर ने अपनी एक अलग राह बना ली और वे हास्य–व्यंग्य के पहले प्रमुख शायर के रूप में जल्वागर हुए । यूँ तो जाफ’र, मीर, सौदा, गालिब और दूसरे शायरों के यहाँ हास्य और व्यंग्य की सुन्दर छटाएँ देखने को मिलती हैं, लेकिन इनमें से किसी को भी बाकायदा हास्य–व्यंग्य का शायर नहीं कहा जा सकता । ये ‘अकबर’ थे जिन्होंने उर्दू शायरी में अपनी बात कहने के लिए हास्य–व्यंग्य का सहारा लिया और एक ऐसी नई रवायत की बुनियाद डाली जो आज तक फल–फूल रही है । विचारधारा के स्तर पर देखें तो पश्चिमी ज्ञान–विज्ञान और पश्चिमी सभ्यता का जितना भारी विरोध ‘अकबर’ के यहाँ दिखाई देता है उतना किसी और शायर के यहाँ नहीं दिखाई देता । इसी तरह ‘अकबर’ धार्मिक और सामाजिक सुधार के भी विरोधी थे । बदलते हुए हालात में ‘अकबर’ की शिकस्त लाज“मी थी और कहीं हास्य के साथ और कहीं दुख के साथ उन्होंने अपनी इस शिकस्त का इज“हार भी किया है । लेकिन इस नकारात्मक पहलू के अन्दर जो सकारात्मक तत्त्व मौजूद हैं, सावधानी के साथ उनकी निशानदही किए बिना ‘अकबर’ के साथ इंसाफ’ करना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है ।

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    Akbar Allahabadi

    नाम: सैयद अकबर हुसैन रिज़्वी।

    जन्म: 16 नवम्बर 1846, इलाहाबाद।

    शिक्षा और रोज़गार: दोनों साथ-साथ चले। 1866 में मुख़्तारी और फिर हाईकोर्ट में मिस्लख़्वानी। कुछ समय तक नायब-तहसीलदारी। 1872 में वकालत की परीक्षा पास करके 1880 तक वकालत करते रहे। उसके बाद मुंसिफ़, 1888 में जज और 1892 में अदालते-ख़ुफ़िया के जज हुए। सरकार से, आगे चलकर ख़ानबहादुर का खि़ताब भी मिला। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के फ़ेलो भी रहे। भारतीय रंगमंच पर गांधी के उदय के बाद उनके प्रशंसक रहे, मगर 1921 के असहयोग आंदोलन को पूरी तरह देख-समझ नहीं सके और न उसका कोई विशेष प्रभाव ग्रहण कर सके।

    प्रकाशन: ‘अकबर’ की शायरी का एक दीवान उनके जीवन-काल में ही प्रकाशित हुआ, और फिर इज़ाफ़ों के साथ अनेकों बार इसका पुनर्प्रकाशन होता रहा।  ‘अकबर’ के कुल्लियात को आखि़री शक्ल बहुत बाद में जाकर मिली।

    मृत्यु: सितम्बर 1921 में, जबकि असहयोग आन्दोलन अभी ज़ोर ही पकड़ रहा था।

     

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