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Pratinidhi Shairy : Akhtar Sheerani

Pratinidhi Shairy : Akhtar Sheerani

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  • Pages: 212P
  • Year: 2010, 1st Ed.
  • Binding:  Paperback
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Radhakrishna Prakashan
  • ISBN 13: 9788183613132
  •  
    1905 में रियासत टोंक में जन्मे दाउद खान शीरानी, जो आगे चलकर 'अख्तर' शीरानी के नाम से मशहूर हुए, एक बहुत ही अमीर और प्रभावशाली पिता के पुत्र थे ! देश-विभाजन से पहले ही उनके पिता हाफिज महमूद खान शीरानी लाहौर आकर बस गए और यहाँ भी उनको वही मर्तबा हासिल हुआ जो टोंक में हुआ करता था ! जाहिर है कि नौजवान दाउद खां के लिए पैसे-कौड़ी की कोई समस्या नहीं थी; शायरी भी उनके लिए पैसा कमाने का जरिया नहीं, शौक थी ! फिर क्या करण है कि यही दाउद खान शीरानी बीच में ही तालीम से बेजार होकर आवारागर्दी को अपना मशगला बना बैठे ? क्या करण है कि 'अख्तर' बनकर उन्होंने खुद को शराब में डुबो लिया ? वह कौन से प्रेरणा थी जिसने उनके और उनके वालिद या घरवालों के बीच कोई सम्बन्ध लगभग छोड़ा ही नहीं ? वह कौन सी कसक थी जो उनको हिंदुस्तान के कोने-कोने में लिये फिरी ? इस और ऐसे ही दूसरे अनेक सवालों के जवाब अभी भी पूरी तरह और संतोषजनक ढंग से सामने नहीं आये हैं ! लेकिन इतना तय है कि 'अख्तर' शीरानी एक बहुत ही निराशाजनक सीमा तक अपने माहौल से कटे हुए थे, और उनके व्यक्तित्व की ठीक यही विशेषता उनके कृतित्व की निर्धारक शक्ति भी बनी ! रहा सवाल 'अख्तर' साहब की शायरी का, तो इसमें शक नहीं कि वे बहुत कम उम्र में ही कुल-हिन्द शोहरत के शायरों में गिने जाने लगे थे और पत्र-पत्रिकाओं में उनका कलाम छपने के लिए होड़ सी लगी रहती थी ! लेकिन उनकी उदासीनता का, दुनिया से बेजारी का आलम यह था कि अपने जीवनकाल में उन्होंने अपना संग्रह प्रकाशित कराने की तरफ ध्यान तक नहीं दिया; उनकी रचनाओं का संकलन उनकी मृत्यु के बाद ही हुआ ! नागरी लिपि में 'अख्तर' की अभी तक बहुत छोटे-छोटे दो-एक चयन ही सामने आए हैं जो कि पाठक की प्यास को बुझाने का पारा नहीं रखते ! मगर यह शिकायत प्रस्तुत संकलन को लेकर नहीं आएगी, इसका हमें विश्वास है !

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    Akhtar Sheerani

    'अख्तर शीरानी'

    नाम : दाउद खां शीरानी, तखल्लुस अख्तर !

    जन्म : 1905 में राजस्थान की भूतपूर्व रियासत टोंक के एक बहुत समृद्ध परिवार में ! पिता हाफिज महमूद खां शीरानी देश-विभाजन से पहले ही लाहौर आकर बस गए थे, मगर टोंक से परिवार का सम्बन्ध बहुत दिनों बाद तक बना रहा !

    जीवनवृत्ति : लड़कपन से ही शिक्षा की तरफ से मन उचट चूका था, इसलिए 'अख्तर' उच्च शिक्षा से वंचित ही रहे ? वैसे अंग्रेजी साहित्य पर कुछ हद तक उनकी निगाह जरूर रही ! आगे चलकर नशे में डूबे रहना और देश के कोने-कोने में भटकना ही उनका मशगला रह गया ! रोमान नाम से एक पत्रिका भी जारी की, मगर उनकी अपनी प्रकृति के करण यह पत्रिका भी बहुत दिनों तक चल नहीं सकी; लेकिन अहमद 'नदीम' कासमी और कुछ दूसरे साहित्यकारों से उर्दू जगत को इसी पत्रिका ने परिचित कराया ! देश-विभाजन से कुछ पहले अफवाह उडी कि टोंक से लाहौर आते हुए 'अख्तर' साहब रास्ते में ही कहीं क़त्ल कर दिए गए ! जब वे इधर-उधर के रास्तों से होकर लाहौर पहुंचे तो लोगों ने चैन की सांस ली !

    निधन : 9 सितम्बर, 1948 को लाहौर के मेयो हस्पताल में, बहुत ही दर्दनाक हालत में !

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