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Pratinidhi Shairy : Majaz Lakhnavi

Pratinidhi Shairy : Majaz Lakhnavi

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  • Pages: 202p
  • Year: 2005
  • Binding:  Paperback
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Radhakrishna Prakashan
  • ISBN 10: 8171197167
  •  
    ‘मजाज“’ की गिनती उन थोड़े से शायरों में की जा सकती है जिन्होंने कम उम्र में ही ऐसी शोहरत हासिल की कि आगे आनेवाली सारी नस्लें उनकी शायरी पर सर धुनें । ‘मजाज“’ की ख़ासकर ‘आवारा’ जैसी नज़्में तो भाषा की तमाम दीवारें तोड़कर व्यापक रूप से तमाम साहित्य–प्रेमियों के दिलों में अपनी जगह बना चुकी हैं । ‘मजाज“’ की शायरी उस दौर की शायरी है जब उर्दू में तरक्की पसन्द अदब का आन्दोलन रफ्“ता–रफ्“ता अपने लड़कपन से शबाब की ओर बढ़ रहा था । आजादी की जंग और उसी के साथ तरक्की पसन्द अदब की सारी आशा–निराशा, उसके उतार–चढ़ाव, उसके सारे दु:ख–दर्द, खुशियाँ, उसकी सारी उमंगें और उसका सारा आदर्शवाद कला के स्तर पर ‘मजाज“’ की शायरी में साफ’ दिखाई देते हैं, और यही सब तत्त्व हैं जिन्होंने ‘मजाज“’ को इनसान की कुव्वत और उसके सुनहरी मुस्तक’बिल में भरोसा रखना सिखाते हुए उनसे ‘ख़्वाबे–सेहर’ और ‘रात और रेल’ जैसी खूबसूरत नज़्में कहलवार्इं । और यही कारण है कि जहाँ तरक्की पसन्द मुसन्निफीन की अंजुमन को दुनिया के रंगमंच से विदा हुए कोई आधी सदी का अरसा गुज“र चुका है, वहीं उसकी बेहतरीन पैदावारों में से एक के रूप में ‘मजाज“’ की शायरी आज भी अपने पूरे तबो–ताब के साथ हमारे सामने आती है, और जि“न्दगी भर दर्दो–रंज से निहाल रहनेवाला यह ‘शायरे–आवारा’ अपने तमाम दर्दो–रंज से ऊपर उठकर दुनिया और दुनिया के सारे दुखों पर छा जाता है । मजाज“ के दोस्त सलाम मछली शहरी को राँची की पहाड़ियों से आती जो आवाज“ सुनाई पड़ी थी, उसमें कहीं कुछ भी ग“लत नहीं था ।

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    Majaz Lakhnavi

    नाम: असरारुल-हक़।

    जन्म: 1911, क़स्बा रुदौली, ज़िला बाराबंकी, उत्तरप्रदेश। स्वतंत्रता-सेनानियों के एक परिवार में।

    शिक्षा: लखनऊ और अलीगढ़। 1935 में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से बी.ए.।

    रोज़गार: देहली और कुछ दूसरी जगहों पर नौकरी की। आल इंडिया रेडियो की उर्दू पत्रिका के सम्पादक रहे। 1936 में वापस लखनऊ आकर वहीं बस गए। यहीं से पत्रिका ‘नया अदब’ की शुरुआत की। 1946 में बंबई पहुँचे, मगर फिर जल्द ही वापस लखनऊ आ गए।

    विशेष: विदुषी और साहित्य-प्रेमी बहन सूफ़िया ने जाँनिसार अख़्तर से विवाह किया जो उर्दू के प्रमुख कवियों में गिने जाते हैं। (मशहूर गीतकार और संवाद-लेखक जावेद अख़्तर इसी दंपति की संतान हैं।) जाँनिसार अख़्तर के नाम सफ़िया के ख्शुतूत का उर्दू के पत्र-साहित्य में एक महत्त्वपूर्ण स्थान है।

    प्रकाशन: ‘मजाज़’ के जीवन-काल में ही उनके संग्रह आहंग के अनेक संस्करण निकले। कुछ अन्य रचनाओं को शामिल करके यही संकलन 1945 में शबे-वार के नाम से प्रकाशित हुआ। 1949 में साज़े-नौ का प्रकाशन। उसके बाद मजाज़ का सारा काव्य आहंग के नाम से ही प्रकाशित होता रहा है।

    मृत्यु: 1956 में लखनऊ में, दिमाग़ की नस फट जाने से।

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