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Prayojanmoolak Hindi : Sanrachana Evam Anuprayog

Prayojanmoolak Hindi : Sanrachana Evam Anuprayog

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  • Pages: 313p
  • Year: 2008
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Radhakrishna Prakashan
  • ISBN 13: 9788171193387
  •  
    शताब्दियों से ‘राष्ट्रभाषा’ के रूप में प्रतिष्ठित और लोक-व्यवहार में प्रचलित ‘हिंदी’ पिछले कई दशकों से ‘राजभाषा’ के संवैधानिक दायरे में भी विकासोन्मुख है। ‘राष्ट्रभाषा’ की मूल प्रकृति तथा ‘राजभाषा’ की संवैधानिक स्थिति को अलगानेवाली प्रमुख रेखाएँ आज भी शिक्षित समाज के बहुत बड़े वर्ग के लिए अस्पष्ट-सी हैं। इसके लिए जहाँ हिंदी भाषा के उद्भव से लेकर ‘मानक’ भाषा तथा ‘राष्ट्रभाषा’ स्वरूप धारण करने तक की सुदीर्घ विकास-परम्परा का सर्वेक्षण आवश्यक है, वहीं 14 सितंबर, 1949 ई. से लेकर आज तक के समस्त संवैधानिक प्रावधानों, नियमों-अधिनियमों एवं शासकीय आदेशों और संसदीय संकल्पों आदि का सम्यक् अनुशीलन भी वांछनीय है। इस अनुशीलन-प्रक्रिया के दौरान तत्संबंधी समस्याओं तथा उनके व्यावहारिक समाधान के समायोजन का उपक्रम भी अपेक्षित है। आज इन अपेक्षाओं के दायरे और भी विस्तृत हो गए हैं क्योंकि हिंदी अब लोक-व्यवहार की सीमाओं से आगे बढ़कर, विभिन्न शैक्षणिक, प्रशासनिक, व्यावसायिक तथा कार्यालयी स्तरों पर भी अपनी प्रयोजनमूलकता प्रतिपादित करने के दायित्व-निर्वाह की ओर अग्रसर है। इस दायित्व-निर्वाह का निकष है - उसके संरचना-सामर्थ्य का अनुप्रयोगात्मक कार्यान्वयन। इस दिशा में विभिन्न स्तरों पर विविध प्रयास चल रहे हैं, किंतु उनमें एकरूपता, पारस्परिक एकसूत्रता तथा समन्वयशीलता का अभाव होने से, अनेक समस्याएँ गत्यावरोध का कारण बन रही हैं। इन्हीं समस्याओं के निवारण हेतु, हिंदी के प्रयोजनमूलक संरचना-सूत्रों के समुचित संयोजन तथा उनकी अनुप्रयोगात्मक संभावनाओं के समन्वित- सुसंग्रथित रेखांकन का विनम्र प्रयास इस पुस्तक का लक्ष्य है। कुवेंपु साहित्य: विविध आयाम भारतेन्दु का भाषा-प्रेम, मैथिलीशरण गुप्त की सांस्कृतिकता, जयशंकर प्रसाद की दार्शनिकता, पंत का प्रकृति-प्रेम, महादेवी वर्मा की रहस्यात्मकता, निराला की क्रांतिकारिता, हजारीप्रसाद द्विवेदी की परम्परा-निष्ठा, प्रेमचन्द की सामाजिक- प्रतिबद्धता, रेणु की आंचलिकता, नागार्जुन की फक्कड़ता, केदारनाथ अग्रवाल का ग्रामीण-प्रेम, हरिशंकर परसाई की व्यंग्यात्मकता और आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की वैज्ञानिकता को अपने साहित्य में समेटनेवाले रचनात्मक व्यक्तित्व का नाम है - कुवेम्पु। कन्नड़ भाषा के प्रथम ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित ‘कन्नड़ कविरत्न’ के व्यक्तित्व एवं कृतित्व के विविध पक्षों पर विद्वत्तापूर्ण व्यापक अध्ययन को प्रस्तुत करनेवाले आलेखों का संग्रह।

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    Ram Prakash

    जन्म: 1968, हैदराबाद (आन्ध्र प्रदेश)।

    शिक्षा: बी.ए. (1990), उस्मानिया विश्वविद्यालय, एम.ए. (1992), हैदराबाद विश्वविद्यालय (स्वर्णपदक प्राप्त), नेट.ए.पी.एस.सी. (1992), यू.जी.सी., जे.आर.एफ. (1993), पी-एच.डी. (1996) हैदराबाद विश्वविद्यालय।

    अध्यापन: प्राध्यापक (1993-96), स्नातक महाविद्यालय, प्राध्यापक (1996-2003) मैसूर विश्वविद्यालय, मैसूर, प्रवाचक (2003-2007), कुवेम्पु विश्वविद्यालय, शिमोगा।

    कृतियाँ: रचना बनाम आलोचना (2003), रचना और आलोचना का द्वन्द्व (2005), प्रगतिशील आलोचना और रामविलास शर्मा (2007)।

    सम्पादन: कुवेम्पु साहित्य: विविध आयाम (2008) कुवेम्पु की प्रतिनिधि कहानियाँ (2008) समकालीन हिन्दी साहित्य: विविध आयाम (प्रकाशनाधीन)।

    सम्प्रति: सह आचार्य, श्री वेंकटेश्वर विश्वविद्यालय, तिरुपति (आन्ध्र प्रदेश)।

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