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Prayojanmulak Hindi Ki Nai Bhumika

Prayojanmulak Hindi Ki Nai Bhumika

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  • Pages: 622p
  • Year: 2018, 3rd Ed.
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Lokbharti Prakashan
  • ISBN 13: 9788180311239
  •  
    भाषा किसी भी देश की संस्कृति का अक्षय कोष होती है। यही परम्परा से संस्कृति के विचारों को लेकर आधुनिकता से मिलाती है। वस्तुत: भाषा जुम्मां-जुम्मां कह चुकने का अमूर्त माध्यम ही नहीं होती है, बल्कि खुद को अपने समाज और परंपरा से जोड़े रखने का प्रेम-बंधन भी है। वह भटकाव और गुमनामी के अंधेरे में आस्था की अक्षत् मशाल बन 'गाइड' की तरह आगे-आगे चल राह दिखाती है। सौभाग्य से, भारतीय सर्जनात्मकता का अपराजेय संकल्प हिन्दी उक्त सभी गुणों को जीती है। व्यक्ति द्वारा विचित्र रूपों में बरती जाने वाली इस हिन्दी भाषा को भाषा-विज्ञानियों ने स्थूल रूप से सामान्य और प्रयोजनमूलक इन दो भागों में विभव किया है। सुखद सूचना यह है कि हिन्दी की इन नितांत ताजा-टटकी और कई संदर्भों में बेहद नयी भाषिक-संरचना या नवजात शिशु रूप को केन्द्रीय विश्वविद्यालयों के साथ-साथ तकरीबन हर प्रादेशिक विश्वविद्यालयों ने अपने-अपने पाठ्यक्रमों में शामिल कर इसे सम्मानित किया है। प्रयोजनमूलक हिन्दी आज इस देश में बहुत बड़े फलक और धरातल पर प्रयुक्त हो रही है। केन्द्र और राज्य सरकारों के बीच संवादों का पुल बनाने में आज इसकी महती भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। आज इसने एक ओर कम्प्यूटर, टेलेक्स, तार, इलेक्ट्रॉनिक, टेलीप्रिंटर, दूरदर्शन, रेडियो, अखबार, डाक, फिल्म और विज्ञापन आदि जनसंचार के माध्यमों को अपनी गिरफ्त में ले लिया है, तो वही दूसरी ओर शेयर बाजार, रेल, हवाई जहाज, बीमा उद्योग, बैंक आदि औद्योगिक उपक्रमों, रक्षा, सेना, इंजीनियरिंग आदि प्रौद्योगिकी संस्थानों, तकनीकी और वैज्ञानिक क्षेत्रों, आयुर्विज्ञान, कृषि, चिकित्सा, शिक्षा, ए.एम.आई.ई. के साथ विभिन्न संस्थाओं में हिन्दी माध्यम से प्रशिक्षण दिलाने कॉलेजों, विश्वविद्यालयों, सरकारी-अर्द्धसरकारी कार्यालयों, चिट्ठी-पत्री, लेटर पैड, स्टॉक-रजिस्टर, लिफाफे, मुहरें, नामपट्ट, स्टेशनरी के साथ-साथ कार्यालय-ज्ञापन, परिपत्र, आदेश, राजपत्र, अधिसूचना, अनुस्मारक, प्रेस-विज्ञप्ति, निविदा, नीलाम, अपील, केवलग्राम, मंजूरी पत्र तथा पावती आदि में प्रयुक्त होकर अपने महत्व को स्वत: सिद्ध कर दिया है। कुल मिलाकर यह कि पर्यटन बाजार, तीर्थस्थल, कल-कारखाने, कचहरी आदि अब प्रयोजनमूलक हिन्दी की जद में आ गए हैं। हिन्दी के लिए यह शुभ है। अनेक विद्वानों के सहयोग से लिखी यह गम्भीर कृति अपने पाठकों को संतुष्ट अवश्य करेगी, ऐसा मेरा विश्वास है।

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    Kailash Nath Pandey

    डॉ. कैलाश नाथ पाण्डेय

    डॉ. कैलाश नाथ पाण्डेय की ख्याति एक चर्चित भाषा-वैज्ञानिक के रूप में है । आप गाजीपुर जनपद की सैदपुर तहसील स्थित ग्राम-रामपुर माँझा के निवासी हैं । आपने बी.ए., स्नातकोत्तर महाविद्यालय, गाजीपुर (उत्तर प्रदेश) तथा एम.ए. केन्दीय विश्वविद्यालय सागर (मध्य प्रदेश) से उत्तीर्ण किया । लगभग चालीस वर्षों तक हिन्दी-अध्यापन के पश्चात् स्नातकोत्तर महाविद्यालय, मलिकपुरा, गाजीपुर के हिन्दी विभागाध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त ।

    आपकी प्रमुख कृतियाँ हैं-‘भाषा विज्ञान का अनुशीलन', भाषा विज्ञान का रसायन, 'हिन्दी : कुछ नई चुनौतियाँ' , 'सन्त सुन्दरदास', ‘उर्दू : दूसरी राजभाषा', ‘प्रयोजनमूलक हिन्दी की नई भूमिका', कार्यालयीय हिन्दी, हिन्दी पत्रकारिता : संवाद और विमर्श, हिन्दी आलोचना का अन्त:पाठ, 'प्रयोजनमुलक हिन्दी की संकल्पना' आदि ।

    आप उदय नारायण तिवारी स्मृति सम्मान, पाणिनी पुरस्कार, श्यामसुन्दर दास पुरस्कार, सारस्वत सम्मान आदि से सम्मानित किये जा चुके हैं ।
    सम्पर्क : नवकापुरा, लंका, गाजीपुर, उ.प्र. ।

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