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Prem : Ek Album

Prem : Ek Album

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  • Pages: 63p
  • Year: 1999
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Radhakrishna Prakashan
  • ISBN 13: 8171194990
  •  
    समकालीन मलयालम कविता जहाँ-जहाँ रूढ़ अवशेषों से टकराती है और अपनी भाषिक एवं सांस्कृतिक स्वत्वगत मौलिकता को बनाए रखते हुए समय में रचे-बसे औपनिवेशिक आयामों का अनावरण करती है वहाँ यह समकालीन साबित होती है । मलयालम कविता का यह सृजनात्मक व दृष्टिसंपन्न उन्मेष बहुआयामी इसलिए है कि वह सत्ता के बहुरंगी वर्चस्व को पहचानती है । अत: समकालीन मलयालम कविता एककेंद्री नहीं बल्कि बहुकेंद्री है । उसकी बहुरचरता समय के सही सरोकारों से उपजी विशेषता है । इसलिए उसका प्रतिरोधी स्वर तमाम जटिल स्थितियों में अनुवादगूंजित हो उठता है । आज की मलयालम कविता में नारी-स्वत्व का स्वर विद्रोह की बहिरंग मुखरता मात्र नहीं है । उसका पूरा तेवर मुक्ति की कामना को आद्यंत अनावृत करने का रहा है । पुरुषकेंद्रित सामाजिक वर्चस्व को सरलीकृत करना मलयालम की नारीवादी कविता का उद्‌देश्य नहीं है । पुरुष-केंद्रीकरण को वह नए संदर्भ में प्रस्तुत करती है । ... ...मलयालम कविता ने नारी-दृष्टि को इसी व्यापक संदर्भ में अनुभव किया है । एक इतिहासबद्ध दृष्टि उसका संबल ही नहीं है बल्कि वह उसकी अवस्थिति है । स्त्री-कामनाओं की कविता पुरुषविरोधी कविता नहीं है, वह पुरुषाधिष्ठित एकांगी मूल्यों की विरोधी कविता है । व्यापक संदर्भ में वह विपक्ष की कविता है । मुक्ति की पारदर्शी स्थिति उसमें अंकित है । वह अधिकार- केंद्रित संस्कृति पर आघात करती है । ...मलयालम कविता में आधुनिक दौर से लेकर यह मुक्तिकामी स्‍वर मुखर रहा है । उसमें तमाम अवरोधों को तोड़ने का आग्रह भी है । ... समकालीन मलयालम कविता में वीएम. गिरिजा का स्वर सबसे अधिक तेज तेवर से युक्त है । उनकी कविता के केंद्र में उत्तप्त नारी ही विद्यमान है । उनके स्वर में विद्रोही दृष्टि की एकायामी बुलंदियाँ नहीं है । गिरिजा के अनुभव-जगत् में स्त्री पूर्णरूपेण यथार्थ है । वह नैतिक अवलंब के सहारे प्रस्तुत नहीं होती है । वह अपनी जैविक स्थिति में प्रस्तुत होती है । इसलिए गिरिजा अपनी कविताओं में प्रकृति का भरसक उपयोग करती हैं । प्रत्येक प्रकरण प्रकृति के सहज विन्यास के साथ जुड़कर जैविक स्थिति का बोध कराता है । सवाल यह है कि गिरिजा की कविता की यह हरियाली किससे संबंधित है? हरियाली के साथ उन्होंने मिट्‌टी के मटमैलेपन को भी उभारा है । लोकोन्‍मुखता का यह परिदृश्य गिरिजा की कविता का यथार्थ है जिससे उनकी सृजनात्मकता उभार लेती है और उनकी दृष्टि हमारी नैतिकताओं की जटिलताओं की भीतरी स्थितियों की थाह लेती है । प्रकृति यहाँ रूमानी आग्रह से विन्यासित नहीं है । 'इको-पोयट्री' की तरह जल, आकाश और हरियाली के बिंबों और प्रतीकों की आवृत्ति गिरिजा करती रहती हैं । अपने में विकसने को उद्यत, अपने में संपुष्ट और अपने में संपूर्ण स्त्री-कामनाओं की विराट उपस्थिति गिरिजा के हर एक शब्द को बारीक बना देती है । प्रेम का यह एलबम प्रेमाभिव्यक्ति को निरी भावानुभूति के स्तर पर प्रस्तुत करने वाली कविताओं का आकलन-भर नहीं है 1 यह प्रेम के मूल्यों को खोजने का धारदार उपक्रम भी है । -भूमिका से

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    V.M.Girija

    V.M.Girija

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