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Puchho Parsai Se

Puchho Parsai Se

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  • Pages: 744p
  • Year: 2013
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9788126724239
  •  
    ‘पूछो परसाई से’ अपने ढंग की एक अनूठी पुस्तक है। हरिशंकर परसाई का रचनात्मक हस्तक्षेप स्थायी, परिवर्तनकारी और बहुआयामी रहा है। उन्होंने अपने साहित्य में समाज के अनेक पक्षों पर मौलिकता के साथ विचार किया है। वस्तुतः उनका समस्त लेखन भाषा, साहित्य और समाज की धरोहर है। यह पुस्तक हरिशंकर परसाई की मनीषा के कई विलक्षण आयाम रेखांकित करती है। प्रश्नोत्तर शैली की परम्परा अति प्राचीन है। ‘पूछो परसाई से’ इसी परम्परा का आधुनिक संस्करण है। ‘देशबन्धु’ समाचार-पत्र में नियमित रूप से प्रकाशित होनेवाला यह स्तम्भ अत्यन्त लोकप्रिय था। देश के कोने-कोने से जागरूक उत्सुक पाठक अपने प्रिय लेखक परसाई से भाँति-भाँति के प्रश्न पूछते थे। इन प्रश्नों में दुनिया जहान की जाने कैसी-कैसी जिज्ञासाएँ भरी रहती थीं।...और परसाई प्रश्न की प्रकृति के अनुसार सूचनात्मक, विश्लेषणात्मक, तुलनात्मक, व्यंग्यात्मक आदि शैलियों में उत्तर देते थे। यही कारण है कि प्रायः सर्वाधिक समय तक नियमित प्रकाशित होनेवाला यह स्तम्भ आज भी विषय-वैविध्य और ‘बहुआस्वादकता’ का उदाहरण बना हुआ है। ‘पूछो परसाई से’ में हरिशंकर परसाई की प्रचलित छवि भी एक नया विस्तार पाती है। परसाई की विचारधारा और भावप्रवणता पुस्तक की प्राणशक्ति है। इसमें व्याप्त तार्किकता, सरलता, सहजता और आत्मीयता के दर्शन भी उत्तरों में होते हैं। जाने कितने उकसाने वाले प्रश्नों के उत्तर भी उन्होंने पूरी सहजता से दिए हैं। उदाहरणार्थ, एक प्रश्न है- ‘आपके पास हर प्रश्न का जवाब है। क्या आप अक्ल के जहाज हैं?’ परसाई का उत्तर है- ‘मेरे पास हर प्रश्न का जवाब नहीं है। जवाब सही हो, यह भी जरूरी नहीं है। मैं लगातार सीखता जाता हूँ। मामूली आदमी हूँ।’ समग्रतः इस पुस्तक में ज्ञान, प्रेरणा और रोचकता का एक भरा-पूरा संसार पाठकों के लिए सुरक्षित है।

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    Harishankar Parsai

    हरिशंकर परसाई

    जन्म : 22 अगस्त, 1924। जन्म-स्थान : जमानी गाँव, जिला होशंगाबाद (मध्य प्रदेश)। मध्यवित्त परिवार। दो भाई, दो बहनें। स्वयं अविवाहित रहे।

    मैट्रिक नहीं हुए थे कि माँ की मृत्यु हो गई और लकड़ी के कोयले की ठेकेदारी करते पिता को असाध्य बीमारी। फलस्वरूप गहन आर्थिक अभावों के बीच पारिवारिक जिम्मेदारियाँ। यहीं से वास्तविक जीवन-संघर्ष, जिसने ताकत भी दी और दुनियावी शिक्षा भी। फिर भी आगे पढ़े। नागपुर विश्वविद्यालय से हिन्दी में एम.ए.। फिर ‘डिप्लोमा इन टीचिंग’।

    प्रकाशित कृतियाँ : हँसते हैं रोते हैं, जैसे उनके दिन फिरे (कहानी-संग्रह); रानी नागफनी की कहानी, तट की खोज (उपन्यास); तब की बात और थी, भूत के पाँव पीछे, बेईमानी की परत, वैष्णव की फिसलन, पगडंडियों का ज़माना, शिकायत मुझे भी है, सदाचार का ताबीज, विकलांग श्रद्धा का दौर (सा.अ. पुरस्कार); तुलसीदास चंदन घिसैं, हम इक उम्र से वाकिफ  हैं, जाने -पहचाने लोग (व्यंग्य निबंध-संग्रह)।

    रचनाओं के अनुवाद लगभग सभी भारतीय भाषाओं और अंग्रेजी में।

    ‘परसाई रचनावली’ शीर्षक से छह खंडों में रचनाएँ संकलित।

    निधन : 10 अगस्त, 1995

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