• (011) 23274463
  • Help
INR
 
Shopping Cart (0 item)
My Cart

You have no items in your shopping cart.

You're currently on:

Sadho ! Jag Baurana

Sadho ! Jag Baurana

Availability: In stock

-
+

Regular Price: Rs. 250

Special Price Rs. 225

10%

  • Pages: 144p
  • Year: 2013
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9788126724581
  •  
    मुकेश कुमार टेलीविजन की दुनिया का एक जाना- माना नाम है । साहित्य से जुडे तमाम लोग उन्हें दूरदर्शन पर डॉ. नामवर सिंह के साथ पुस्तक चर्चा के अत्यन्त चर्चित कार्यक्रम सुबह-सवेरे के माध्यम से, हस में पिछले आठ सालों से प्रकाशित उनके स्तम्भ कसौटी के कारण तथा कई टेलीविजन चैनलों को शुरू करके उन्हें सफल बनानेवाले एंकर के रूप में भी जानते- समझते रहे हैं । लेकिन उनके बहुविध व्यक्तित्व के बहुत से पहलू लोगों से अभी तक क़रीब-क़रीब छिपे हुए रहे हैं जिनमें उनका व्यंग्यकार, कथाकार तथा कवि रूप भी शामिल है । टेलीविजुन की दुनिया में रहकर अपने परिवार तक के लिए समय निकाल पाना मुश्किल हो जाता है और हड़बड़ी की इस दुनिया में अपनी संवेदनाएँ बचाना प्राय: असम्भव ही होता है । अत : आश्चर्य होता है किइस दुनिया में लगातार रहकर खासकर कविता के लिए समय उन्होंने कैसे और कहाँ से निकाल लिया होगा? और यों ही अपनी भावनाएँ व्यक्त करने के लिए कविता के नाम पर कुछ भी लिख देना तो सम्भव या आसान है मगर कविता के आधुनिक मुहावरे को समझते हुए अपने पेशेवर काम से एक बिस्कूल ही अलग दुनिया रच देना अगर असम्भव नहीं तो बेहद मुश्किल और जटिल है । मुकेश की विशेषता सिर्फ यह नहीं है कि वे कविताएँ लिखते हैं, यह भी है जैसा कि ऊपर कहा गया, वे इसमें संवेदनाओं की एक अलग दुनिया रचते हैं । यह दुनिया दैनिक और हर घंटे या हर दस मिनट बाद टीवी के पर्दे पर आनेवाली ज्यादातर सतही और कामचलाऊ खूबरों और उनके विश्लेषण की दुनिया से बिस्कूल ही अलग है । इन कविताओं को पढ़ते हुए पाठकों को याद ही नहीं आएगा कि यह वही मुकेश हैं जिन्हें रात के समय समाचारों का कोई कार्यक्रम प्रस्तुत करते हमने-आपने देखा है, हालाकि वहाँ भी उनका तीखापन कहीं खोता नहीं जैसे कि हंस के उनके स्तम्भ में भी यह बेधड़क ढंग से व्यक्त होता है । इन कविताओं में से कम कविताओं में ही आज की राजनीति से सीधे-सीधे रूप से कवि वाबस्ता है । ये कविताएँ उनके कोमल और लड़ाकू दोनों पक्षों को एक साथ उजागर करती हैं । वे अ के चाँद की बात इनमें करते हैं, साथ ही समुद्र की नदियों की, स्मृतियों की, साँकल की (जो जीवन से प्राय : खो चुकी है) प्यार की, अपने और बच्चों के बचपन की, आत्मनिर्वासन की और ऐसी ही कई-कई बातें करते हैं । वे कई ताजे टटके बिम्ब रचते हैं । दूज का चाँद उन्हें बिना मूठ का हँसिया नजर आता है जो तारों की फसल काटने के काम आता है । इन कविताओं में नदी अपनी आत्मकथा लिखती पाई जाती है । इनमें कवि स्मृतियों के घर में रहता हुआ पाया जाता है । और मुकेश यह सारा काम टेलीविजन की अत्यन्त शब्दस्फीत दुनिया से अलग पर्याप्त भाषा संयम से करते हैं । उनकी कविताएँ छोटी हैं, स्पष्ट हैं और लगभग उतने ही शब्दों का इस्तेमाल करती हैं जितने का प्रयोग करना अनिवार्य है और यह अनुशासन हासिल करना आसान नहीं है । कई नामी कवि बेहद शब्दस्फीत हैं । उनमें कहीं-कहीं एक गहरा आक्रोश भी है तो कहीं एक गहरा आत्मविश्वास भी- इसलिए कितना भी घना क्यों न हो अँधेरा जितना जान पड़ता है उतना घना नहीं होता अँधेरा । और ऐसे आत्मविश्वास का अर्थ तब ज्यादा है जब कवि को पता है कि- जिन्हें पूजा हो गए पत्थर पूजते- पूजते लोग भी हो गए पत्थर देवता भी पत्थर पुजारी भी पत्थर सब पत्थर पत्थर ही पत्थर । जब सब तरफ पत्थर ही पत्थर हों, हमारे आदर्श देवता और पुजारी तक जब पत्थर हो चुके हों, तब रचने की चुनौती ज्यादा गम्भीर है क्योंकि रचना के स्रोत भी पथरा चुके हैं । ऐसे कठिन समय में सरल- आत्मीय कविताएँ रचनेवाले मुकेश कुमार केइस संग्रह की तरफ आशा है सबका ध्यान जाएगा, हालाँकि स्थितियाँ साहित्य से जुड़े लोगों के भी पथरा जाने की हैं ।

    Customer Reviews

    There are no customer reviews yet.

    Write Your Own Review

    Mukesh Kumar

    मुकेश कुमार

    जन्म : 1 अक्टूबर, 1964, शहडोल, मध्यप्रदेश में।

    शिक्षा : प्राणिशास्त्र में एम.एस-सी. और जनसंचार एवं पत्रकारिता में स्नातक। टेलीविज़न न्यूज़ एवं बाज़ार के संबंधों में टीआरपी की भूमिका पर शोध।

    लगभग अट्ठाईस वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय। दैनिक समय, देशबंधु, माया, सेंटिनल, दैनिक नईदुनिया और समय सूत्रधार में काम करने के बाद बीस साल से टेलीविज़न पत्रकारिता।

    टेलीविज़न की दुनिया का जाना-पहचाना चेहरा। परख, फिलहाल, कही अनकही, सुबह सवेरे, साहित्य भारती और आपकी बैठक जैसे कार्यक्रमों में बतौर प्रस्तोता, निर्माता, निर्देशक कार्य किया। छह न्यूज़ चैनलों (सहारा-मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़, एस-1, वॉयस ऑफ इंडिया मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़, वॉयस ऑफ इंडिया-राजस्थान, मौर्य टीवी एवं न्यूज़ एक्सप्रेस) की सफलतापूर्वक शुरूआत की। भैरव प्रसाद गुप्त की कहानी पर आधारित टेलीफिल्म कंठा का सह निर्देशन एवं उसमें अभिनय भी किया। टीवी टुडे द्वारा निर्मित आज की नारी धारावाहिक के लिए पटकथा लेखन भी किया। इसके अलावा कई वृत्त चित्रों का निर्माण भी किया।

    पुस्तकें : टेलीविज़न पत्रकारिता पर लंबी शृंखला के तहत दो पुस्तकें टेलीविज़न की कहानी और ख़बरें विस्तार से प्रकाशित।

    अनुवाद की दो पुस्तकें प्रकाशित। फ्रांसीसी लेखक गाय सोर्मन की किताब जीनियस ऑफ इंडिया का हिंदी में भारत की आत्मा के नाम से और रक्षा विशेषज्ञ श्रीधर द्वारा लिखित किताब अफगानिस्तान बुज़कशी का लहूलुहान अफगानिस्तान के नाम से।

    कविता संकलन 'साधो! जग बौराना’ ।

    छिटपुट कहानियाँ एवं व्यंग्य लेखन।

    संपर्क : सी-1302 एपेक्स ग्रीन वैली, सेक्टर-9, वैशाली, $गाजि़याबाद, उत्तरप्रदेश।

    मोबाइल : 09811818858

    ई-मेल : mukeshkabir@gmail.com

    वीडियो : mukeshkumar.info

    loading...
      • Sarthak An Imprint of Rajkamal Prakshan
      • Chahak An Imprint of Rajkamal Prakshan
      • Funda An Imprint of Radhakrishna
      • Korak An Imprint of Radhakrishna

    Location

    Address:1-B, Netaji Subhash Marg,
    Daryaganj, New Delhi-02

    Mail to: info@rajkamalprakashan.com

    Phone: +91 11 2327 4463/2328 8769

    Fax: +91 11 2327 8144