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Sahitya Ka Uttar Samajshastra

Sahitya Ka Uttar Samajshastra

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  • Pages: 195p
  • Year: 2006
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Radhakrishna Prakashan
  • ISBN 10: 8183610471
  •  
    गोष्ठियों के रूप अभी भी शादी-ब्याह की तरह हैं। एक दूल्हा, बाकी बाराती। गोष्ठी के मंच जातिभेद कराते हैं। ऊपर महान बैठेंगे। नीचे दासानुदास। एकदम विनय पत्रिका वाली हाइरार्की। प्रगतिशील, रूपवादी सब ये ही करते हैं। बहस न सही, तू-तू, मैं-मैं ही सही। कुछ तो है। बुरा क्या है? नए पूँजीवाद में ये तो होना ही है। मशाल टार्च बन चुकी है। राजनेता के पास जो ब्रांड टार्च है, वही साहित्यकार के पास है। ‘साहित्य और राजनीति’ की चिर बहस अब मर चुकी है। यही अच्छा है। पढ़ें तो जानें, क्योंकि ये ‘अन्दर की बात है’! साहित्य का असल समाजशास्त्र है ! यह ‘अन्दर की बात’ बहुत जटिल है रे! और हम सब जो ‘बचे-खुचे’ हैं, तरह-तरह की ‘पूरणीय क्षतियाँ’ हैं जो हर गोष्ठी, सेमिनार, शोकसभा में मौजूद रहती हैं। हांेगी कोई हजार-पाँच सौ। हम सब अपूरणीय ‘क्षति’ करके ही जाएँगे। बच्चो सावधान!

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    Sudhish Pachauri

    सुधीश पचौरी

    जन्म : 29 दिसंबर, 1948; अलीगढ़ (उ.प्र.)।

    शिक्षा : एम.ए. (हिन्दी, आगरा विश्वविद्यालय), पीएच.डी. एवं पोस्ट डॉक्टोरल शोध (हिन्दी, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली)।

    दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में प्रोफेसर। अब सेवा-निवृत्त।

    माक्र्सवादी समीक्षक, प्रख्यात स्तंभकार, मीडिया-विशेषज्ञ, भारतेंदु हरिश्चंद्र पुरस्कार से सम्मानित।

    प्रकाशित पुस्तकें : नई कविता का वैचारिक आधार; कविता का अंत; निर्मल वर्मा और उत्तर-उपनिवेशवाद; दूरदर्शन की भूमिका; दूरदर्शन: स्वायत्तता और स्वतंत्रता (सं.); नए जन-संचार माध्यम और हिन्दी (सं.); उत्तर-आधुनिकता और उत्तर-संरचनावाद; नवसाम्राज्यवाद और संस्कृति; दूरदर्शन : दशा और दिशा; नामवर के विमर्श (सं.); दूरदर्शन : विकास से बाजार तक; उत्तर-आधुनिक साहित्यिक विमर्श; मीडिया और साहित्य; उत्तर-केदार (सं.); देरिदा का विखंडन और साहित्य; साहित्य का उत्तरकांड : कला का बाजार; टीवी टाइम्स; इक्कीसवीं सदी का पूर्वरंग; अशोक वाजपेयी : पाठ-कुपाठ; प्रसार भारती और प्रसारण-परिदृश्य; साइबर-स्पेस और मीडिया; स्त्री देह के विमर्श; आलोचना से आगे; हिन्दुत्व और उत्तर-आधुनिकता; मीडिया, जनतंत्र और आतंकवाद; ब्रेक के बाद; बिंदास बाबू की डयरी; पॉपूलर कल्चर; फासीवादी संस्कृति और सेकूलर पॉप-संस्कृति; साहित्य का उत्तर-समाजशास्त्र आदि।

    सम्प्रति : वाक् त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका का सम्पादन।

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