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Sakharam Binder

Sakharam Binder

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  • Pages: 158p
  • Year: 2014, 2nd Ed.
  • Binding:  Paperback
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Lokbharti Prakashan
  • ISBN 13: 9788180315725
  •  
    श्रीमती सरोजिनी वर्मा द्वारा मराठी के वर्चस्वी नाटककार श्री विजय तेंडुलकर की अत्यंत विवादस्पद और बहुचर्चित कृति 'सखाराम बाइंडर' का सशक्त और प्राणवान अनुवाद, जिसने रंगमंच पर दांपत्य जीवन की गोपनीय नैतिकता का साहसपूर्ण ढंग से पर्दाफाश किया है ! सरकारी नियंत्रण को चुनौती देकर उच्चतम न्यायालय से लेखकीय अभिव्यक्ति के आधार पर मान्यता पाने वाला अपने ढंग का अकेला और अनूठा नाटक है ! 'सखाराम बाइंडर' को इस तरह प्रस्तुत किया गया है कि वह गलाजत से भरी दिखावटी संभ्रांतता को पहली बार इतने सक्षम ढंग से चुनौती देता है ! रटे-रटाये मूल्यों को सखाराम ही नहीं इस नाटक के सारे पात्र अपनी पात्रता की खोज में ध्वस्त करते चले जाते हैं ! जिन नकली मूल्यों को हम अपने ऊपर आडम्बर की तरह थोप कर चिकने-चुपड़े बने रहना चाहते है, उसे सही-सही इस आइने में निर्ममता से उघडता हुआ देखते हैं ! 'सखाराम बाइंडर' वही आइना है ! भाषा के स्तर पर सारे पत्र बड़ी खुली और ऐसी बाजारुपन से संयुक्त भाषा का प्रयोग करते हैं जिन्हें हमने अकेले-दुकेले कभी सुना जरुर होगा ! किन्तु उसे अपने संस्कारिता का अंश मानने में सदैव कतराते रहे हैं ! पुरे नाटक में कथावस्तु की विलक्षणता न होते हुए भी पात्रों का आपसी संयोजन भाषा के जिस स्तर पर नाटककार ने किया है, वही नाटकीयता को उभारने में अदभुत रूप से सफल हुआ !

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    Vijay Tendulkar

    विजय तेन्दुलकर

    जन्म : 6 जनवरी, 1928 । मराठी के आधुनिक नाटककारों में शीर्षस्थ विजय तेन्दुलकर अखिल भारतीय स्तर पर प्रतिष्ठित एक महत्त्वपूर्ण नाटककार थे । 50 से अधिक नाटकों के रचयिता तेन्दुलकर ने अपने कथ्य और शिल्प की नवीनता से निर्देशकों और दर्शकों, दोनों को बराबर आकर्षित किया । पूरे देश में उनके नाटकों के अनुवाद एवं मंचन हो चुके हैं । हिन्दी में उनके 30 से अधिक नाटक खेले जा चुके हैं ।

    ‘खामोश ! अदालत जारी है’, ‘घासीराम कोतवाल’, ‘सखाराम बाइंडर’, ‘जाति ही पूछो साधु की’ और ‘गिद्ध’ आदि बहुचर्चित-बहुमंचित नाटकों के अलावा उनकी प्रमुख नाट्य रचनाएँ हैं: ‘अंजी’, ‘अमीर’, ‘कन्यादान’, ‘कमला’, ‘चार दिन’, ‘नया आदमी’, ‘बेबी’, ‘मीता की कहानी’, ‘राजा माँगे पसीना’, ‘सफ़र’, ‘नया आदमी’, ‘हत्तेरी किस्मत’, ‘आह’, ‘दंभद्वीप’, ‘पंछी ऐसे आते हैं’, ‘काग विद्यालय’, ‘काग़ज़ी कारतूस’, ‘नोटिस’, ‘पटेल की बेटी का ब्याह’, ‘पसीना-पसीना’, ‘महंगासुर का वध’, ‘मैं जीता मैं हारा’, ‘कुत्ते’, ‘श्रीमंत’, 'विठ्ठला' आदि।

    विजय तेन्दुलकर के नाटकों में मानव जीवन की विषमताओं, स्वाभाविक व अस्वाभाविक यौन सम्बन्धों, जातिगत भेदभाव और हिंसा का यथार्थ चित्रण मिलता है । उनके अधिकांश पात्र मध्यम एवं निम्न मध्यमवर्ग के होते हैं और उनके विभिन्न रंग इन नाटकों में आते हैं ।

    निधन : 19 मई, 2008

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