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Sampatti ka Srijan

Sampatti ka Srijan

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  • Pages: 308p
  • Year: 2008
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9788126715077
  •  
    सन् 1868 में जमशेतजी टाटा ने एक व्यापारिक कम्पनी की शुरुआत की तो शायद ही किसी ने कल्पना की होगी कि वे आधुनिक भारत के निर्माण की दिशा में नए अध्याय की शुरुआत कर रहे हैं। जमशेतजी के सामने यह स्पष्ट था कि भारत के औद्योगिक विकास के लिए तीन घटक सबसे महत्त्वपूर्ण हैं: पहला इस्पात, दूसरा हाइड्रो-इलेक्ट्रिक पावर और तीसरा तकनीकी शिक्षा और शोध। आज लगभग डेढ़ सदी बाद टाटा परिवार दावा कर सकता है कि उन्होंने अपने संस्थापक के सपनों को पूर्णतया साकार किया है। लेकिन सफलता की यह मंजिल आसान नहीं रही है। इस पुस्तक में पहली बार हम जान पाते हैं कि 1992 के आर्थिक सुधारों के बाद, कम्पनी ने किस प्रकार अपना रास्ता बनाया। पुस्तक का उपसंहार स्वयं रतन टाटा ने लिखा है और इसमें उन्होंने स्पष्ट रूप से, सहकर्मियों के प्रतिरोध समेत, उन तमाम कठिनाइयों के बारे में बताया है जिनका सामना उन्हें नई परिस्थितियों के अनुसार ढलने में करना पड़ा। यह बहुपठित और बहुचर्चित पुस्तक हमें विस्तार से बताती है कि भारतीय राष्ट्र के निर्माण में, न सिर्फ उद्यमी के रूप में बल्कि फैक्टरी सुधारों, श्रम एवं सामाजिक कल्याण, औषधीय शोध, उच्च-शिक्षा, संस्कृति-कला और ग्रामीण विकास आदि क्षेत्रों में अपने योगदान के रूप में भी टाटा ने कितनी अहम भूमिका निभाई है।

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    R. M. Lala

    रूसी एम. लाला ने अपने कार्यकाल का प्रारम्भ 1948 में 19 वर्ष की आयु में पत्रकारिता से किया। 1959 में वे लंदन में प्रथम भारतीय पुस्तक प्रकाशन-गृह के प्रबन्धक बने और 1964 में उन्होंने (राजमोहन गांधी के साथ मिलकर) हिम्मत वीकली की नींव रखी, जिसका उन्होंने एक दशक तक सम्पादन किया। उनकी प्रथम पुस्तक द क्रिएशन ऑफ वेल्थ, 1981 में प्रकाशित हुई जिसका प्रकाशकीय एवं व्यावसायिक दोनों ही : ष्टि से अप्रत्याशित स्वागत हुआ। इसके बाद कई अन्य पुस्तकें आईं जिनमें बियोंड द लास्ट ब्लू माउंटेन: ए लाइफ ऑफ जे. आर. डी. टाटा (1992), सेलीब्रेशन ऑफ द सैल्स: लैटर्स फ्रॉम ए कैंसर सरवाइवर (1999), ए टच ऑफ ग्रेटनेस: एनकाउंटर्स विद द ऐमिनेंट (2001), फॉर द लव ऑफ इंडिया: द लाइफ एंड टाइम्स ऑफ जमशेतजी टाटा (2004), इन सर्च ऑफ इथिकल लीडरशिप (2005) और रोमांस ऑफ टाटा स्टील (2007) सम्मिलित हैं।

    रूसी एम. लाला की पुस्तकों का अन्य भाषाओं, जिनमें जापानी भी शामिल है, अनुवाद हो चुका है। वे अठारह वर्षों तक टाटाओं के प्रमुख न्यास, सरदोराबजी टाटा ट्रस्ट के निदेशक रहे। वे सेंटर फ़ॉर एडवांसमेंट ऑफ़ फिलेन्थ्रॉपी के सह-संस्थापक रहे, और 1993 से इसके अध्यक्ष हैं।

    मॉरिओ मिराण्डा, जिनके चित्र इस पुस्तक में आए हैं, अत्यन्त लोकप्रिय कार्टूनिस्ट एवं चित्रकार हैं। उनकी रचनाओं का व्यापक प्रदर्शन एवं प्रकाशन हुआ है।

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