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Samvaad Anayas

Samvaad Anayas

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  • Pages: 178p
  • Year: 1993
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Radhakrishna Prakashan
  • ISBN 13: 8171191231
  •  
    इस पुस्तक के रचनाक्रम के बारे में सुपरिचित कथा- कार गोविन्द मिश्र के इन शब्दों को उद्धृत किया जाना चाहिए-'ऐसा शायद हमेशा रहा होगा जब एक समय में लिख रहे दो साहित्यकार पारस्परिक संवाद में लम्बे समय के लिए रहे हों-उनकी हर रचना में पारस्परिक साझेदारी रही हो । मुंशी अजमेरी और मैथिलीशरण गुप्त, गुलेरीजी और रामचन्द्र शुक्ल आदि में ऐसा कुछ सुना जाता है । ये वे दिन थे जब चीजें अपेक्षाकृत साफ थीं, आस्थाएं भी सुनिश्चित थीं । आज जैसा आस्था का संकट तब नहीं था । इसलिए तब रचनाशीलता में साझे- दारी फार्म, भाषा, छन्द.. .इन तक सीमित रहती होगी । जो हमारा समय है, उसमें संवाद, साझेदारी रचना के पहले की.. .ये ज्यादा जरूरी हो गए हैं ... कि हम एक-दूसरे को भटकने से बचाए रख सकें, जो साहित्य में संघर्ष का रास्ता है, उसी पर चलने की अपनी जिद बनाए रख सकें । जो तकलीफें, विषाद, संत्रास उपजे, उन्हें आपस में बाँटते हुए चल सकें-चलने की गरिमा महसूस करते हुए । बल्लभ और मेरा संवाद जो इधर अनायास हुआ, वह इसी कशिश को लेकर हुआ है ।' एक समय और एक ही विधा में लिख रहे दो संवेदन- शील साहित्यकारों -गोविन्द मिश्र और बल्लभ सिद्धार्थ-के इस संवाद में प्रेरणा एक-दूसरे को तर्क से काटने की नहीं, बल्कि दूसरे की बात को कुरेदने और विस्तार करने की है । यह संवाद उन सभी सवालों से जूझता है, जिनसे आज का कोई भी रचनाकार किनारा नहीं कर सकता -दुःख, संत्रास, जीवन, संसार, आज का समय, लेखकीय कर्म, अध्यात्म और धर्म, समाज या व्यवस्था और लेखक का विरोध, उस विरोध का स्वरूप, साहित्य और कला की पहचान, कलाकार की मृत्यु.. .और, और भी जाने कितने सवाल । इन बड़े सवालों की तह में हमें दो लेखकों की कशमकश की झलक भी मिलती है । अगर लेखक की कार्यशाला जैसी कोई चीज हो सकती है तो यहां वह भी है । संक्षेप में कहा जाए तो हिन्दी में अपनी तरह की यह पहली पुस्तक है ।

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    Govind Mishra

    1965 से लगातार और उत्तरोत्तर स्तरीय लेखन के लिए सुविख्यात। गोविन्द मिश्र इसका श्रेय अपने खुलेपन को देते हैं। समकालीन कथा-साहित्य में उनकी अपनी अलग पहचान है - एक ऐसी उपस्थिति जो एक सम्पूर्ण साहित्यकार का बोध कराती है, जिसकी वरीयताओं में लेखन सर्वोपरि है, जिसकी चिन्ताएँ समकालीन समाज से उठकर ‘पृथ्वी पर मनुष्य’ के रहने के सन्दर्भ तक जाती हैं और जिसका लेखन-फलक ‘लाल पीली ज़मीन’ के खुरदरे यथार्थ, ‘तुम्हारी रोशनी में’ की कोमलता और काव्यात्मकता, ‘धीरसमीरे’ की भारतीय परम्परा की खोज, ‘हुजूर दरबार’ और ‘पाँच आँगनोंवाला घर’ की इतिहास और अतीत के सन्दर्भ में आज के प्रश्नों की पड़ताल - इन्हें एक साथ समेटे हुए है। कम साहित्यकार होंगे जिनका इतना बड़ा ‘रेंज’ होगा और जिनके सृजित पात्रों की संख्या की हज़ार से ऊपर पहुंच रही होगी, जिनकी कहानियों में एक तरफ़ ‘कचकौंध’ के गँवई गाँव के मास्टर साहब हैं तो ‘मायकल लोबो’ जैसा आधुनिक पात्र या ‘ख़ाक इतिहास’ की विदेशी मारिया भी। गोविन्द मिश्र बुन्देलखंड के हैं तो बुन्देली उनकी भाषायी आधार है, लेकिन वे उतनी ही आसानी से ‘धीरसमीरे’ में ब्रजभाषा और ‘पाँच आँगनोंवाला घर’ और ‘पगला बाबा’ में बनारसी-भोजपुरी में भी सरक जाते हैं। प्राप्त कई पुरस्कारों/सम्मानों में ‘पाँच आँगनोंवाला घर’ के लिए 1998 का ‘व्यास सम्मान’, 2008 में ‘साहित्य अकादेमी’ (केन्द्रीय पुरस्कार), 2011 में ‘भारत भारती सम्मान’, 2013 का ‘सरस्वती सम्मान’ विशेष उल्लेखनीय हैं।

    प्रकाशित रचनाएँ:

    उपन्यास: वह/अपना चेहरा, उतरती हुई धूप, लाल पीली ज़मीन, हुजूर दरबार, तुम्हारी रोशनी में, धीरसमीरे, पाँच आँगनोंवाला घर, फूल...इमारतें और बन्दर, कोहरे में क़ैद रंग, धूल पौधों पर, अरण्यतंत्र; कहानी-संग्रह: दस से ऊपर; अन्तिम पाँच - पगला बाबा, आसमान...कितना नीला, हवाबाज़, मुझे बाहर निकालो, नये सिरे से; सम्पूर्ण कहानियाँ: निर्झरिणी (दो खंड); यात्रा-वृत्त: धुंध-भरी सुर्ख़ी, दरख़्तों के पार...शाम, झूलती जड़ें, परतों के बीच; निबन्ध: साहित्य का सन्दर्भ, कथा भूमि, संवाद अनायास, समय और सर्जना, साहित्य, साहित्यकार और प्रेम, सान्निध्य साहित्यकार; कविता: ओ प्रकृति माँ!; बाल-साहित्य: मास्टर मनसुखराम, कवि के घर में चोर, आदमी का जानवर। समग्र यात्रा-वृत्त: रंगों की गंध (दो खंड), चुनी हुई कविताएँ (तीन खंड)।

    सम्प्रति: एच.एक्स. 94, ई-7, अरेरा कॉलोनी, भोपाल-462016

    फोन: 0755-2467060, मो. 09827560110

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