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Saundaryashastra Ke Tattva

Saundaryashastra Ke Tattva

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  • Pages: 306p
  • Year: 2017, 7th Ed.
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 10: 8171786383
  • ISBN 13: 9788171786381
  •  
    कविता के सौंदर्यशास्त्रीय अध्ययन की आवश्यकता इसलिए है कि वह न सिर्फ मनुष्य के सर्जनात्मक अंतर्मन की एक रचनात्मक प्रक्रिया है, बल्कि उसकी संरचना में अन्य कलाओं के तत्त्व और गुण भी समाहित होते हैं। भारतीय काव्य-चेतना की परंपरा के अनुसार भी काव्यशास्त्रीय ग्रंथों में कविता के कलात्मक अंश और काव्येतर तत्त्वों के समागम की अवहेलना नहीं की गई है। इसलिए ललित कलाओं की व्यापक पृष्ठभूमि में काव्य का तात्त्विक अध्ययन जरूरी है। इसी को कविता का सौंदर्यशास्त्रीय अध्ययन कहते हैं। लेकिन अनेक विद्वानों द्वारा समय-समय पर इस आवश्यकता को रेखांकित किए जाने के बावजूद हिंदी-आलोचना-साहित्य में अभी तक हम इस दिशा में छिटपुट निबंधों, लेखों से आगे नहीं बढ़ सके हैं। जो काम सामान्यतः सामने आया है, वह अपेक्षित सौंदर्यशास्त्रीय दृष्टिकोण और तात्त्विक विश्लेषण के अभाव के चलते संतोषजनक नहीं है। यह पुस्तक हिंदी साहित्य की उस कमी को पूरा करने का एक महत्त्वपूर्ण प्रयास है। इसमें सौंदर्यशास्त्रीय अध्ययन की अभी तक उपलब्ध परंपरा की पूर्वपीठिका में काव्य के प्रमुख तत्त्वों, यथा - सौंदर्य, कल्पना, बिंब और प्रतीक का विशद और हृदयग्राही विवेचन किया गया है। अपने विषय में ‘प्रस्थान-ग्रंथ’ बन सकने की क्षमतावाली इस पुस्तक में सौंदर्यशास्त्र को व्यावहारिक आलोचना के धरातल पर उतारा गया है जिसका प्रमाण द्वितीय खंड में प्रस्तुत छायावादी कविता का सौंदर्यशास्त्रीय अध्ययन है। इसकी दूसरी विशेषता है सौंदर्यशास्त्र की स्वीकृत और अंगीकृत मान्यताओं के आधार पर काव्यशास्त्र की एक नई दिशा की ओर संकेत। कहा जा सकता है कि यह ग्रंथ कई दृष्टियों से ज्ञान की परिधि का विस्तार करता है और हिंदी साहित्य में सौंदर्यशास्त्रीय या कलाशास्त्रीय मान्यताओं के सहारे निष्पन्न एक ऐसे अद्यतन काव्यशास्त्र का रूप उपस्थित करता है, जिसमें परंपरागत प्रणालियों के अनुशीलन से आगे बढ़कर नवीन चिंतन और आधुनिक वैज्ञानिक उद्भावनाओं का भी उपयोग किया गया है।

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    Dr. Kumar Vimal

    साहित्यिक जीवन का प्रारंभ काव्य-रचना से हुआ। किंतु, क्रमशः आलोचना में प्रवृत्ति रम गई। 1949 से ही हिंदी की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में कविता, कहानी, आलोचनात्मक निबंधादि प्रकाशित हो रहे हैं।

    पटना विश्वविद्यालय से 1954 ई. में एम.ए. (हिंदी) और 1964 ई. में डी.लिट्. की उपाधि प्राप्त की। संप्रति बिहार लोक सेवा आयोग के सम्मानित सदस्य हैं। इसके पूर्व बिहार राष्ट्रभाषा-परिषद्, पटना के निदेशक-पद पर कार्य कर चुके हैं। इन्होंने बिहार सरकार द्वारा स्थापित साहित्यकार कलाकार-कल्याण कोष-परिषद् के आद्य सचिव के रूप में बिहार के अनेक साहित्यकारों और कलाकारों की उल्लेखनीय सेवा की है। अध्यापन के प्रति इन्हें सहज अनुराग है। ये पटना विश्वविद्यालय में कई वर्षों तक हिंदी के अध्यापक रह चुके हैं।

    सन् 1973 ई. में इन्होंने राजकीय अतिथि के रूप में जर्मनी, चेकोस्लोवाकिया और सोवियत रूस की सांस्कृतिक यात्रा की है तथा यूरोप के अन्य कई देशों का भ्रमण किया है। इनकी आलोचनात्मक कृतियाँ पुरस्कार-योजना समिति, उत्तर प्रदेश, बिहार राष्ट्रभाषा-परिषद् तथा हरजीमल डालमिया पुरस्कार समिति, दिल्ली द्वारा पुरस्कृत हो

    चुकी हैं।

    अब तक आठ आलोचना-ग्रंथ, दो संपादित पुस्तकें और तीन कविता-संग्रह प्रकाशित।

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      • Sarthak An Imprint of Rajkamal Prakshan
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