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Stree : Deh Ki Rajniti Se Desh Ki Rajniti Tak

Stree : Deh Ki Rajniti Se Desh Ki Rajniti Tak

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  • Pages: 143p
  • Year: 2019, 4th Ed.
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Radhakrishna Prakashan
  • ISBN 13: 9788171798063
  •  
    हमारे उपनिषदों–पुराणों के समय से स्त्रियों को लेकर जिन नियमों और मर्यादाओं की रचना हुई, उनकी स्वाधीनता और आत्म–निर्भरता के ख़िलाफ़ निहित स्वार्थों द्वारा जो महीन किस्म का सांस्कृतिक षड्यंत्र रचा गया और भारतीय संविधान के लागू होने के बाद भी व्यावहारिक जीवन में स्त्रियों को जिन जटिल अन्तर्विरोधों से जूझना पड़ रहा है–पुस्तक में प्रस्तुत लेखों में एक स्त्री के नज़रिए से इस सबकी समसामयिक सन्दर्भों में पड़ताल की गई है । एक नागरिक और एक कामगार के रूप में स्त्रियाँ पाती हैं–कि स्त्रियों को कमजोर और पराधीन बनाने की कोशिशें पहले उनके ही घर–आँगनों से शुरू होती हैं । और दहलीज़ लाँघने के बाद कार्यक्षेत्र में वही कोशिशें उनके आगे ताकतवर और सामूहिक पुरुष–एकाधिकार की शक्ल धारण करती चली जाती हैं । विडम्बना यह कि एक ओर तो स्त्री में ‘पराधीन’ और ‘सहनशील’ बनने की महत्ता का बीज बचपन से रोपा जाता है और दूसरी ओर उसकी पराधीनता और सहनशीलता की मार्फत उसकी शक्ति का पूरा दोहन और नियोजन खुद उसी के और स्त्री–जाति के विरोध में किया जाता है । नतीजतन एक स्त्री हर क्षेत्र में दोयम दर्जे में बैठने को बाध्य की जाती है कि तुम्हारी नियति यही है ।...यह भेदभाव सिर्फ निम्नवर्गीय स्त्रियों के साथ ही नहीं बरता जाता, इसकी चपेट में वे स्त्रियाँ भी हैं जो सरकारी–ग़ैर–सरकारी विभागों में ऊँचे–ऊँचे पदों पर कार्यरत हैं ।...दिहाड़ी पर काम करनेवाली तमाम कामगार स्त्रियों को आज भी पुरुषों के मुकाबले कम मज़दूरी मिलती है जबकि कार्य के समय व स्वभाव में कोई फर्क नहीं होता । जैविक, सांस्कृतिक और आर्थिक सन्दर्भों में स्त्री की शक्ति और शक्तिहीनता का विवेचन करनेवाली यह पुस्तक स्त्री–शोषण की करुण कथा नहीं, बल्कि उसके कारणों की जड़ में जाकर किया गया भारतीय सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था का ऐसा सटीक विश्लेषण है जो पाठकों को स्त्री के साथ–साथ हरिजनों, भूमिहीनों, दलितों जैसे समाज के हर क्षेत्र में छाए शक्ति–असन्तुलनों के शिकार वर्गों को समझने की नई दृष्टि देगा ।

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    Mrinal Pandey

    मृणाल पाण्डे

    मृणाल पाण्डे का जन्म 26 फरवरी, 1964 को मध्य प्रदेश के टीकमगढ़ में हुआ। प्रयाग विश्वविद्यालय, इलाहाबाद से अंग्रेजी साहित्य में एम.ए. और गन्धर्व महाविद्यालय से ‘संगीत विशारद’  के अलावा आपने कॉरकोरन स्कूल ऑफ आर्ट, वाशिंगटन में चित्रकला एवं डिजाइन का विधिवत् अध्ययन किया।

    कई वर्र्षों तक विभिन्न विश्वविद्यालयों में अध्यापन के बाद पत्रकारिता के क्षेत्र में आईं। साप्ताहिक हिन्दुस्तान, वामा तथा दैनिक हिन्दुस्तान के बतौर सम्पादक समय-समय पर कार्य किया। स्टार न्यूज़ और दूरदर्शन के लिए हिन्दी समाचार बुलेटिन का सम्पादन किया। तदुपरान्त प्रधान सम्पादक के रूप में दैनिक हिन्दुस्तान, कादम्बिनी एवं नन्दन  से जुड़ीं। वर्ष 2010 से 2014 तक प्रसार भारती की  चेयरमैन भी रहीं।

    प्रकाशित पुस्तकें : सहेला रे, विरुद्ध, पटरंगपुर पुराण, देवी, हमका दियो परदेस, अपनी गवाही (उपन्यास); दरम्यान, शब्दवेधी, एक नीच ट्रैजिडी, एक स्त्री का विदागीत, यानी कि एक बात थी, बचुली चौकीदारिन की कढ़ी, चार दिन की जवानी तेरी (कहानी-संग्रह); ध्वनियों के आलोक में स्त्री (संगीत); मौजूदा हालात को देखते हुए, जो राम रचि राखा, आदमी जो मछुआरा नहीं था, चोर निकल के भागा, सम्पूर्ण नाटक और देवकीनन्दन खत्री के उपन्यास काजर की कोठरी  का इसी नाम से नाट्य-रूपान्तरण (नाटक); स्त्री : देह की राजनीति से देश की राजनीति तक, स्त्री : लम्बा सफर (निबन्ध); बन्द गलियों के विरुद्ध (सम्पादन);

    ओ उब्बीरी (स्वास्थ्य); मराठी की अमर कृति मांझा प्रवास : उन्नीसवीं सदी  तथा अमृतलाल नागर की हिन्दी कृति गदर के फूल  का अंग्रेजी में अनुवाद।

    अंग्रेज़ी : द सब्जेक्ट इज वूमन (महिला-विषयक लेखों का संकलन), द डॉटर्स डॉटर, माइ ओन विटनेस (उपन्यास), देवी (उपन्यास-रिपोर्ताज), स्टेपिंग आउट : लाइफ एंड सेक्सुअलिटी इन रुरल इंडिया।

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