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Sulga Hua Raag

Sulga Hua Raag

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  • Pages: 118p
  • Year: 2004
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Radhakrishna Prakashan
  • ISBN 13: 8171198678
  •  
    हिन्दी कविता का अधिकांश इन दिनों जिस प्रकार की नगरीय मध्यवर्गीयता से आक्रान्त होकर आत्मदया, हकलाहट, अन्तहीन रुदन और ऐसे ही नाना प्रपंचों को निचुड़े हुए मुहावरों में प्रकट करता दिखता है उसके बरक्स ‘सुलगा हुआ राग’ में मनोज मेहता की कविताएँ सामर्थ्य भरे विकल्प की तरह आयी हैं। इस संग्रह की कविताओं में समकालीन भारतीय समय और विडम्बनाओं से भरे उसके व्यापक यथार्थ की गहरी समझ है और उसी के साथ है उस यथार्थ की संश्लिष्ट संरचना से प्रसंगों, वस्तुओं, पात्रों और उनकी अन्तर्क्रियाओं को अचूक कौशल के साथ उठाकर अपना काव्यलोक रचने की अनूठी सृजनशीलता जो विस्मयकारी ढंग से कविता के सामान्य चलनवाले अतिपरिचित इलाकों के पार जाकर हमारे लिए गाँव-कस्बों के मामूली मनुष्यों की एक विशाल दुनिया खोलती है। यह वह दुनिया है जहाँ ‘ढुलमुल गँवारू झोपड़ों में’ और ‘ढोल, मादल, बाँसुरी के सुरों में हमारा देश बसता है’। मनोज मेहता के काव्य सामर्थ्य का एक गौरतलब पहलू यह भी है कि लोकजीवन से उनकी संलग्नता उन्हें अपनी भाषा के अन्य बहुतेरे कवियों की तरह अतिशय रोमानीपन की ओर नहीं धकेलती। ‘सुलगा हुआ राग’ में जहाँ मनोज उपलब्ध जीवन को उत्सवित करते हैं वहाँ भी उनका काव्य विवेक अपनी वस्तुपरकता को खोकर असन्तुलित नहीं होता और न ही वह अतिरिक्त ऐश्वर्य अर्जित करने के लिए शिल्प की कलावादी तिकड़मों का सहारा लेता है। यह एक ऐसा काव्य-विवेक है जो आवयविक अनुभवों को लेकर बेहद सादगी और धीरज के साथ अपने आशयों को स्पष्ट करता है और भीषण संकटों के मौजूदा दौर में जीवन प्रसंगों की मानवीय आन्तरिकता को भाषा के आईने में कुछ यों ले आता है कि वह बार-बार अपनी अनोखी आकस्मिकता के नयेपन से हमें एक दुर्लभ सौन्दर्यबोध की जश्मीन पर नये आविष्कार की तरह बाँध लेती है - मानो हमारे भीतर पहले कुतूहल और फिर सरोकारों का खूब समृद्ध ताना-बाना निर्मित करती हुई। ‘सुलगा हुआ राग’ की अन्तर्वस्तु में सहज और आयासहीन जनोन्मुख प्रतिबद्धता है, आख्यान है और निरंतर गूँजती एक लय है जिसमें क्रियाओं और ध्वनियों की आवाजाही और हलचलें शामिल हैं - पर इस सबके बावजूद कुछ भी स्फीत नहीं होता। यहाँ शामिल कविताओं में मनोज मेहता के अनुभव प्रान्तरों की ऐसी अंतर्यात्रा के साक्ष्य हैं जिनमें हमारे सामूहिक मन की बेचैन दीप्तियाँ तो हैं ही, उसकी अपराजेय जिजीविषा का गान भी है। ‘सुलगा हुआ राग’ के एक से दूसरे छोर तक मनोज मेहता ने चाहे जितने भी स्वरों का संयोजन किया हो, यहाँ न तो कहीं किसी विवादी स्वर का खलल है और न ही कोई मुद्रा दोष। ‘सुलगा हुआ राग’ में यह सब संभव हो पाया है तो इसलिए कि इसकी निर्मिति में एक विनम्र किन्तु दृढ़ प्राणवत्ता बसी है। - पंकज सिंह

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    Manoj Mehta

    जन्म: 1964, मुज़फ़्फ़रपुर, बिहार।

    बिहार विश्वविद्यालय से हिन्दी में बी.ए. ऑनर्स और एम.ए.। दिल्ली विश्वविद्यालय से राजकमल चौधरी की लम्बी कविता ‘मुक्ति प्रसंग’ पर एम.फिल. के लिए शोध-प्रबंध।

    कमलेश्वर के संपादन में ‘दैनिक जागरण’ में उप- सम्पादक रहे और उन्हीं के साथ, अख़बार की नीतियों से असहमति के कारण अंततः त्यागपत्र दे दिया।

    कुछ वर्ष तक दिल्ली में फ्रीलांस पत्रकार के रूप में काम करने के बाद बिहार लौटकर प्रगतिशील लेखक संघ के सचिव की हैसियत से सक्रिय रहे। प्रलेस के ग्यारहवें राज्य सम्मेलन के मुख्य संयोजक।

    वर्ष 2000 में पुनः दिल्ली आये और ‘राष्ट्रीय सहारा’ में पत्रकारिता आरम्भ की। सम्प्रति साप्ताहिक ‘सहारा समय’ में कार्यरत।

    सृजन: सबसे पहले 1986 में ‘धर्मयुग’ में कविताएँ प्रकाशित हुईं। तब से आज तक हिन्दी की महत्त्वपूर्ण साहित्यिक पत्रिकाओं में गद्य और कविताओं का निरन्तर प्रकाशन। पहला कविता संग्रह ‘आखेट’ 1996 में यात्री प्रकाशन, दिल्ली से प्रकाशित हुआ।

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