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Swatantroyottar Hindi Natak : Mulya Sankraman

Swatantroyottar Hindi Natak : Mulya Sankraman

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  • Pages: 228p
  • Year: 2007
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Lokbharti Prakashan
  • ISBN 13: 9788180311130
  •  
    स्वाधीनता प्राप्ति के बाद हमारे देश में उपजी एक ज्वलंत समस्या है मानवमूल्य-संक्रमण। डॉ. ज्योतिश्वर मिश्र ने स्वातंत्र्योतर हिन्दी नाटकों में दर्शित इस मूल्य-संक्रमण का गंभीर और प्रामाणिक विवेचन ग्रंथ में किया है। इसमें स्वतंत्रता के बाद लिखे गए लगभग सौ नाटकों को उपयुक्त उद्धरणों सहित संदर्भित किया गया है। स्पष्ट है कि अध्ययन कुछ इने-गिने चर्चित नाटकों तक ही सीमित नहीं रहा। यह लेखक की श्रमशीलता का तथा ग्रंथ की विवेचन-पद्धति उसकी प्रौढ़ दृष्टि का स्पष्ट परिचय देती है। नाटकों के कथ्य तथा शिल्प पर लेखक द्वारा की गई टिप्पणियाँ बहुत ही सार्थक एवं व्यंजक हैं। ग्रंथ की भाषा विषयवस्तु के सर्वथा अनुरूप, प्रभावशाली तथा प्रवाहपूर्ण है। मेरा दृढ़ विश्वास है कि साहित्य और समाजशास्त्र दोनों विषयों के अध्येता इस पंथ से बहुत लाभान्वित होंगे। —प्रोफेसर मोहन अवस्थी आज की जटिल संवेदना को उजागर करने में सक्षम होने एवं अपने समय तथा समाज से प्रश्न करनेवाले एक सशक्त माध्यम के रूप में चर्चित होने के कारण, हिन्दी नाटक आज सर्जनात्मक अभिव्यंजना की श्रेष्ठ विधा के रूप में प्रतिष्ठित हुआ है। हिन्दी नाट्य साहित्य का स्वातंत्र्योतर काल, जो प्राचीनता और नवीनता के अनेक आयामी द्वंद्व से आलोड़ित रहा, मूल्यों की दृष्टि से संक्रमण का काल है। समकालीन नाटककार, भारतीय परिवेश और परिस्थितियों में आए परिवर्तन के अनुरूप मूल्य-संदर्भों के नए क्षितिज की खोज में तथा मानव मूल्यों को नया स्वरूप देने की दिशा में प्रयत्नशील रहे हैं। नाटकों में उच्च मूल्यों के क्षरण, विघटन और उनके निम्न मूल्यों में पर्यवसान की स्थिति तो द्रष्टव्य है ही, इसके विपरीत क्षरित हो रहे परंपरागत कल्याणकारी साध्य मूल्यों को पुनर्स्थापित करने का सबल आग्रह भी यत्र-तत्र व्यक्त हुआ।

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    Jyotishwar Mishra

    Jyotishwar Mishra

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