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Tarapath

Tarapath

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  • Pages: 192p
  • Year: 2009
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Lokbharti Prakashan
  • ISBN 13: 9788180313653
  •  
    तारापथ का यह परिवर्धित संस्करण पंतजी के समग्र काव्य साहित्य का प्रतिनिधित्व करता है । वीणा से लेकर अधुनातन कृति संक्रांति तक के काव्य संग्रहों से उनकी रचनाओं का सुरुचिपूर्ण चयन इसमें प्रस्तुत किया गया है । इस संकलन की विशेषता यह है कि इसमें पंतजी की नवीनतम कृतियों का प्रतिनिधित्व पाठकों को मिलेगा । पन्तजी ने इस युग को एक 'महासंक्रान्ति युग' कहा है । इस महासंक्रान्ति काल की कविता में आस्था और लोकमंगल को प्रतिष्ठित करना किसी भी साधारण प्रतिभा और जीवन-दृष्टि के कवि के बूते के बाहर की बात है । जबकि विघटन, विश्रृंखलता, नैतिक मूल्यों का हास चारों ओर दिखाई पड़ रहा है, उसमें महाकवि पन्त का यह स्वप्न ('मुझे स्वप्न दो, मुझे स्वप्न दो') एक महान जीवन और विराट आस्था की परिकल्पना करता है । यही वह संदेश है, जो समस्त पन्त-काव्य के अन्दर-ही-अन्दर प्रवाहित होता हुआ हमें मिलता है । उनका समस्त काव्य अन्तर्मुखता का काव्य न होकर आत्मोत्कर्ष का काव्य है । यह आत्मोत्कर्ष अपनी समग्र संरचना में एक सार्वभौमिक शुभेच्छा तक ले जाता है । इसीलिए उनका काव्य अतीतोम्मुख न होकर वर्तमान के फलक पर भविष्योन्मुखी काव्य है । यह सार्वभौमिक शुभेच्छा ही वह तत्व है, जिसके भीतर से कवि पन्त ने विश्व-मानव और नव-मानव की परिकल्पना को अपनी कविता में सार्थक किया है । अपनी सम्पूर्ण काव्य-सम्पदा के भीतर से उन्होंने एक नये और निजी अध्यात्म की रचना की है । यह अध्यात्म अपनी मंगलकामना में निजी होते हुए भी 'स्व' की भावना से पूर्णतया मुक्त है ।

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    Sumitranandan Pant

    सुमित्रानंदन पंत

    जन्म: 20 मई, 1900 कौसानी (उत्तरांचल में) ।

    शिक्षा: प्रारम्भिक शिक्षा कौसानी के वर्नाक्यूलर स्कूल में। 1918 में कौसानी से काशी चले गए, वहीं से प्रवेशिका परीक्षा पास की।

    प्रकाशित पुस्तके :

    कविताा-संग्रह: वीणा, ग्रन्थि, पल्लव, गुंजन, ज्योत्स्ना, युगपथ, युगवाणी, ग्राम्या, स्वर्णकिरण, स्वर्णधूली, मधुज्वाल, उत्तरा, रजत-शिखर, शिल्पी, सौवर्ण, युगपुरुष, छाया, अतिमा, किरण-वीणा, वाणी, कला और बूढ़ा चाँद, पौ फटने से पहले, चिदंबरा, पतझर (एक भाव क्रान्ति), गीतहंस, लोकायतन, शंखध्वनि,शशि की तरी, समाधिता, आस्था, सत्यकाम, गीत-अगीत,संक्रांति, स्वच्छंद !

    कथा-साहित्य : हार, पांच कहानियां !

    आलोचना एवं अन्य गद्य-साहित्य : छायावाद : पुनर्मूल्यांकन, शिल्प और दर्शन, कला और संस्कृति, साठ वर्ष : एक रेखांकन !

    पुरस्कार : 1960 में कला और बूढा चाँद पर साहित्य अकादेमी पुरस्कार, 1961 में पद्मभूषण की उपाधि, 1965 में लोकायतन पर सोवियत लैंड नेहरु पुरस्कार, 1969 में चिदंबरा पर भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार !

    28 दिसम्बर 1977 को देहावसान !

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