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Tatvamasi

Tatvamasi

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  • Pages: 168p
  • Year: 2003
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9788126708055
  •  
    केन्द्रीय साहित्य अकादमी, दिल्ली द्वारा वर्ष 2002 में पुरस्कृत यह गुजराती उपन्यास एक ऐसे नायक की कथा है जो सहसा और सहज ही अपने आपको खोजने की एक प्रक्रिया में खुद को पाता है। लेकिन यह ‘आत्मान्वेषण’ जिम्मेदारियों से दूर, एकान्त में नहीं, बल्कि संघर्ष करते मनुष्यों के बीच प्रकृति के मध्य घटित होता है। मनुष्य को संसाधन माननेवाला यह नायक मनुष्य से ‘मानव’ के रूप में साक्षात्कार करता है। पश्चिम के प्रभावों एवं संस्कारों में लिपटा यह नायक इसी प्रक्रिया में अपने भीतर वर्षों की सोई संस्कृति की जड़ों को अंकुरित होते हुए देखता, अनुभव करता है। इस ‘आत्मान्वेषण’ की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि नायक इस बात से अनभिज्ञ है कि वह ‘आत्मान्वेषण’ की प्रक्रिया में है। विरोध से आरंभ हुई उसकी यात्रा स्वीकृति में निःशेष होती है। नर्मदा की भौगोलिक, सांस्कृतिक और जीवन्त उपस्थिति इस उपन्यास की विशिष्टता है। यथार्थ, फंतासी और कल्पना एक-दूसरे में ऐसे घुल-मिल गए हैं कि यह उपन्यास पढ़ना अपने आपमें एक विशिष्ट अनुभव की प्रतीति कराता है। जंगल की आग, जंगल की बारिश, जंगल की चुप्पी, जंगल का शोर, जंगल के दिन, जंगल की रातें, जंगलों में रहते आदिवासी, उनकी संस्कृति और परंपराएँ - सभी कुछ बड़े कौशल के साथ इस उपन्यास में बुना गया है। इसी अर्थ में यह एक भारतीय उपन्यास है।

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    Dhruv Bhatt

    8 मई, 1947, निंगाला, जिला भावनगर, गुजरात

    बी.कॉम (द्वितीय वर्ष) तक पढ़ाई।

    इंजीनियरिंग फर्म में सेक्शन मैनेजर के रूप में निवृत्त।

    कृतियाँ

    उपन्यास: खोवायेलुं नगर (1982), अग्निकन्या (1988), समुद्रांतिके (1993), तत्त्वमसि (1998), अत्रापि (2001)। कविताएँ: श्रुवेन्तु (2001) - अपनी आवाज में एक ऑडियो कैसेट, गाये तेना गीत (2003) - प्रशंसकों द्वारा संकलित- प्रकाशित काव्य संग्रह।

    सम्मान: ‘समुद्रांतिके’ पर चार पुरस्कार: गुजराती साहित्य परिषद् द्वारा ग्रामीण उपन्यास के रूप में, गुजराती साहित्य अकादमी द्वारा यात्रा-संस्मरण के रूप में, मारवाडी सम्मेलन तथा गोवर्धन राम त्रिपाठी सम्मान समिति द्वारा पुरस्कृत।

    ‘तत्त्वमसि’ पर पाँच पुरस्कार - केन्द्रीय साहित्य अकादमी, दिल्ली, गुजराती साहित्य अकादमी, गुजराती साहित्य परिषद्, मारवाडी सम्मेलन तथा कालायतन द्वारा पुरस्कृत।

    ‘अत्रापि’ को गुजराती साहित्य अकादमी का पुरस्कार।

    अनुवाद: ‘समुद्रांतिके’ का मराठी, अंग्रेजी तथा उड़िया में; ‘तत्त्वमसि’ का मराठी, तथा अंग्रेजी में (शीघ्र प्रकाश्य), ‘अत्रापि’ का अंग्रेजी, मराठी तथा फ्रेंच में अनुवाद हो रहा है।

    संप्रति: वलसाड़ जिले के आदिवासी इलाके में शिक्षारत। 

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