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Teen Upanyas

Teen Upanyas

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  • Pages: 238p
  • Year: 2013, 1st Ed.
  • Binding:  Paperback
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9788126721085
  •  
    अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो मामूली नाचने-गानेवाली दो बहनों की कहानी है जो बार-बार मर्दों के छलावों का शिकार होती हैं। फिर भी यह उपन्यास जागीरदार घराने के आर्थिक ही नहीं, भावनात्मक खोखलेपन को भी जिस तरह उभारकर सामने लाता है, उसकी मिसाल उर्दू साहित्य में मिलना कठिन है। एक जागीरदार घरोन के आग़ा फ़रहाद बकौल खुद पच्चीस साल के बाद भी रश्के-क़मर को भूल नहीं पाते और हालात का सितम यह कि उसके लिए बन्दोबस्त करते हैं तो कुछेद ग़ज़लों का ताकि ‘‘अगर तुम वापस आओ और मुशायरों में मदऊ (आमंत्रित) किया जाए तो ये ग़ज़लें तुम्हारे काम आएँगी।’’ आखि़र सब कुछ लुटने के बाद रश्के-क़मर के पास बचता है तो बस यही कि ‘‘कुर्तों की तुरपाई फ़ी कुर्ता दस पैसे...’’ जहाँ उपन्यास का शीर्षक ही हमारे समाज में औरत के हालात पर एक गहरी चोट है, वहीं रश्के-क़मर की छोटी, अपंग बहन जमीलुन्निसा का चरित्र, उसका धीरज, उसका व्यक्तियों को पहचानने का गुण और हालात का सामना करने का हौसला मन को सराबोर भी कर जाता है। खोखलापन और दिखावा-जागीरदार तके की इस त्रासदी को सामने लाने का काम दिलरुबा उपन्यास भी करता है। मगर विरोधाभास यह है कि समाज बदल रहा है और यह तबका भी इस बदलाव से अछूता नहीं रह सकता। यहाँ लेखिका ने प्रतीक इस्तेमाल किया है फिल्म उद्योग का, जिसके बारे में इस तबक़े की नौजवान पीढ़ी भी उस विरोध-भावना से मुक्त है जो उनके बुजुर्गों में पाई जाती थी। मगर उपन्यास का कथानक कितनी पेचीदगी लिए हुए है इसे स्पष्ट करता है गुलनार बानो का चरित्र-इसी तबके की सताई हुई खातून जो अपना बदला लेने के लिए इस तबके की एक लड़की को दिलरुबा बनाती है (इस तरह नज़रिए की इस तब्दीली का माध्यम भी बनती है) और खुदा का शुक्रिया अदा करती है कि उसने ‘‘एक तवील मुद्दत के बाद मेरे कलेजे में ठंडक डाली।’’ तीसरा उपन्यास एक लड़की की ज़िंदगी है जिसे लेखिका की बेहतरीन तख़लीकात में गिना जाता है। यहाँ उन्होंने एक रिफ़्यूजी सिंधी लड़की के जरिए पूरे रिफ़्यूजी तबके के दुख-दर्द को उभारा है। उस लड़के की किरदार को लेखिका ने इस तरह पेश किया है कि वह अकेली शख़्सियत न रहकर रिफ़्यूजी औरत का नुमाइंदा किरदार बन जाती है। इस तरह क़ुर्रतुल ऐन हैदर के ये तीनो उपन्यास उनके फ़न के बेहतरीन नमूनों में गिने जा सकते हैं, साथ ही ये पढ़नेवाले के सामने आज के उर्दू फ़िक्शन के तेवर को बड़े ही कारगर ढंग से पेश करते हैं।

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    Qurratul Ain Haider

    क़ुर्रतुल ऐन हैदर

    जन्म : 1927, अलीगढ़ में। लखनऊ विश्वविद्यालय से अंग्रज़ी में एम.ए.। पिता सज्जाद हैदर यात्दरम और माँ नज़र सज्जाद हैदर दोनों ही उर्दू के मशहूर लेखक। कई देशों का भ्रमण । अंग्रेज़ी पत्रिका 'इम्प्रिंट' और 'इलस्ट्रेटेड वीकली ऑफ़इंडिया' में कई वर्षों तक कार्य किया। उर्दू की नई कहानी को शुरू करनेवालों में से एक सुश्री हैदर का पहला कहानी-संग्रह सितारों से आगे सन 1947 छपी । कहानी-संग्रह पतझड़ की आवाज पर वर्ष 1967 का साहित्य अकादमी पुरस्कार । इसके अतिरिक्त अनुवाद के लिए सोवियत लैंड नेहरु पुरस्कार (1969), पदम्श्री (1984), ग़ालिब मोदी अवार्ड (1984), इक़बाल सम्मान (1987), ज्ञानपीठ पुरस्कार (1991) आदि से सम्मानित । 1994 में साहित्य अकादमी का 'फ़ेलो' बनाया गया।

    प्रकाशित कृतियाँ : मेरे भी सनमख़ाने (1949), सफ़ीन-ए-ग़म-ए-दिल (1953), आग का दरिया (1959), कार-ए-जहाँ दराज़ (1979), निशांत के सहयात्री (1979-'आखिर-ए-शव' के हमसफ़र' का रूपांतरण), गर्दिश-ए-रंग-ए-चमन (1987), चाँदनी बेगम (1990) (सभी उपन्यास); सितारों से आगे (1947), शीशे के घर (1953), पतझड़ की आवाज (1966), रौशनी की रफ़्तार (1981), यह दाग-दाग उजाता (1991), (कहानी-संग्रह); कोहे दमावन (ईरान), गुलगस्त (सोवियत संघ), सितंबर का चाँद (जापान और दक्षिण-पूर्व एशिया), जहान-ए दीगर (अमरीका) (रिपोर्ताज़)।

    निधन : 21 अगस्त, 2007 ।

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