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Thakur Jagmohan Singh Samagra

Thakur Jagmohan Singh Samagra

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  • Pages: 415p
  • Year: 2014
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9788126727339
  •  
    आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने ठाकुर जगमोहन सिंह के साहित्य के वैशिष्ट्य को लक्ष्य करते हुए उचित ही लिखा था कि भारतेन्दु और अन्य कवियों-लेखकों की 'दृष्टि और हृदय की पहुँच मानव-क्षेत्र तक ही थी,' लेकिन 'ठाकुर जगमोहन सिंह ने नरक्षेत्र के सौन्दर्य को प्रकृति के और क्षेत्रों के सौन्दर्य के मेल में देखा है।' ठाकुर जगमोहन सिंह की रचनाओं के इस संंकलन से गुज़रते हुए यह अनुभव किया जा सकता है कि उन्नीसवीं सदी के पुनर्जागरण का मानवतावाद कोरे यथार्थवादी मुहावरे में ही आकार नहीं ले रहा था, बल्कि किंचित रोमैंटिक स्वर में भी ध्वनित हो रहा था। भारतीय आधुनिकता का यह भी एक उल्लेखनीय पहलू है, जिसकी अनदेखी नहीं की जानी चाहिए। महत्त्वपूर्ण यह भी है कि रोमैंटिक स्वर सिर्फ काव्य तक सीमित न रहकर ठाकुर जगमोहन सिंह की 'श्यामा स्वप्न'—जैसी गद्य-कृति से भी प्रकट हो रहा था। दरअसल उनकी संवेदनात्मक बनावट में रोमैंटिक भावबोध की मौजूदगी ऐसी अतिक्रामक है कि उनका गद्य भी, उपन्यास के कलेवर में गठित होने की जद्दो-जहद के बावजूद, खास काव्यात्मक मालूम पड़ता है। सच पूछा जाए तो वे हिन्दी में काव्यात्मक गद्य और रोमांसवाद के प्रणेता हैं। ठाकुर जगमोहन सिंह की रचनात्मक संवेदना में प्रकृति के साथ ही प्रेम की उपस्थिति का केन्द्र स्थानीय है। यह प्रेम और उदग्र ऐन्द्रिकता, जिसकी अभिव्यक्ति रीतिकाव्य में रूढि़वादी तरीके से मिलती है, ठाकुर जगमोहन सिंह के यहाँ अकुंठ और उन्मुक्त सहजता में उन्मोचित है। यहाँ रीति-चेतना का समाहार और प्रकृति-चेतना का समारम्भ घटित होता है। इस तरह ठाकुर जगमोहन सिंह का साहित्य भारतेन्दु-युगीन सृजनशीलता के अनखुले आयामों की ओर इंगित करता है। रमेश अनुपम ने बहुत जतन और परिश्रम से ठाकुर जगमोहन सिंह की लगभग गुम हो चुकी रचनाओं को सहेज-सकेलकर यह संचयन तैयार किया है। निस्सन्देह, इसके प्रकाशन से हिन्दी में आधुनिक साहित्य के आरम्भिक दौर को जानने-समझने में अध्येताओं को मदद मिलेगी। साथ ही इससे अपनी परम्परा की पहचान अपेक्षाकृत समावेशी और अनेकाग्र रूप में स्थापित करने की दृष्टि विकसित हो सकेगी। —जय प्रकाश

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    Ramesh Anupam

    जन्म : 1 अक्तूबर, 1952; धमतरी, छत्तीसगढ़।

    बांग्लादेश से आए विस्थापितों के शरणार्थी शिविर की प्राथमिक पाठशाला से नौकरी की शुरुआत। बाद में दो वर्षों तक बस्तर के डाकघरों की क्लर्की करने के पश्चात् शासकीय महाविद्यालय के प्राध्यापक के रूप में चयन।

    वर्तमान में रायपुर स्थित शासकीय दू्.ब. महिला स्नातकोत्तर महाविद्यालय के हिन्दी विभाग में अध्यापन।

    हिन्दी की अनेक सुप्रसिद्ध पत्र-पत्रिकाओं में समय-समय पर कविताएँ, लेख, साक्षात्कार तथा समीक्षाएँ प्रकाशित।

    'समकालीन हिन्दी कविता’ तथा छत्तीसगढ़ की छह सौ वर्षों की दुर्लभ काव्य-यात्रा पर केन्द्रित ग्रन्थ 'जल भीतर एक वृच्छा उपजै’ का सम्पादन। एक काव्य-संग्रह 'लौटता हूँ मैं तुम्हारे पास’ प्रकाशित।

    सम्पर्क : डब्ल्यू.क्यू.—4, साइंस कॉलेज कैम्पस, रायपुर, छत्तीसगढ़, 492010

    दूरभाष : 094252-25050

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