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Ummid Hai Aayega Vah Din

Ummid Hai Aayega Vah Din

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  • Pages: 494p
  • Year: 2007
  • Binding:  Paperback
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9788126713851
  •  
    यह उपन्यास मजदूर आन्दोलन में स्वतःस्‍फूर्तता की महत्ता स्पष्ट करते हुए संघर्ष में सचेतनता के आविर्भाव और क्रमिक विकास की जटिल और. मंथर प्रक्रिया को तथा संघर्ष की विभिन्न मंजिलों को इतने प्रभावी ढंग से दर्शाता है कि मजदूर आन्दोलन में सक्रिय कार्यकर्ताओं के लिए आज भी यह एक जरूरी अध्ययन-सामग्री लगने लगता है । झोला ने इस प्रक्रिया का प्रभावशाली चित्रण किया है कि किस प्रकार अल्पविकसित चेतना वाले मजदूर नये विचारों के कायल होते हैं, किस प्रकार अपनी जीवन-स्थिति को नियति मानकर जीनेवाले मजदूरों के सोचने-समझने का ढंग हड़ताल के प्रभाव में बदलने लगता है और किस प्रकार वे आन्दोलन द्वारा उठाये गये सवालों को समझने और उनके हल के बारे में सोचने की कोशिश करने लगते हैं । उपन्यास मजदूरों की हड़ताल के दौरान कार्यनीति या रणकौशल (टैक्टिक्स) से जुड़े प्रश्नों पर भी विस्तार में जाता हे । मिसाल के तौर पर इसमें हड़ताल के दौरान तोड़फोड़ की कार्रवाई और 'फ्लाइंग पिकेट्‌स' की सम्भावित भूमिकाओं पर भी विचार किया गया है । 'फ्लाइंग पिकेट्‌स' की हड़ताल के दौरान एक विशेष भूमिका दर्शायी गयी है । यह इतिहास का तथ्य है कि फ्रांसीसी कोयला खदानों में इनकी स्थापित परम्परा रही थी और 1869 की ल्‍वार हड़ताल के दौरान इनका विशेष रूप से इस्तेमाल किया गया था । उपन्यास एक तरह से उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध के यूरोपीय मजदूर आन्दोलन का एक लघु प्रतिरूप प्रस्तुत करता है । खदान मजदूरों के एक छोटे से गाँव में तीन राजनीतिक धाराओं के सुस्पष्ट-सटीक प्रतिनिधियों की उपस्थिति हमें देखने को मिलती है । रासेनोर एक सुधारवादी है जो टकराव के बजाय वार्ताओं की राजनीति में विश्वास रखता है । सूवारीन अराजकतावादी है । एतिएन की अवस्थिति इन दोनों के बीच की बनती है । अनुभववादी ढंग से वह जुझारू वर्ग संघर्ष की सोच और क्रान्तिकारी जनदिशा की सोच की ओर आगे बढ़ता हुआ चरित्र है । पेरिस कम्यून के पूर्व, पहले इण्टरनेशनल में भी यही तीन राजनीतिक धाराएँ कमोबेश .प्रभावी रूप में मौजूद थीं ।

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    Emile Zola


    एमील ज़ोला
    जन्म : 2 अप्रैल, 1840, पेरिस । मृत्यु : 29 सितम्बर 1902, पेरिस । झोला फ्रांस आ बसे इतालवी पिता और फ्रांसीसी माँ की सन्तान था । झोला के बचपन और कैशोर्य का अधिकांश समय दक्षिणी फ्रांस में एक्स-अं-प्रोवेंस में बीता, जहाँ उसके सिविल इंजीनियर पिता म्‍युनिसिपल वाटर सिस्टम के निर्माण के काम में लगे हुए थे । पेरिस में अपनी स्कूली पढ़ाई पूरी कर लेने के बाद झोला दो प्रयासों के बाद भी बेकेलोरिएत परीक्षा में उत्तीर्ण न हो सका । नतीजतन उच्च शिक्षा के रास्ते बन्द हो गये और झोला को रोजगार की तलाश में जुट जाना पड़ा । अगले दो वर्ष ज्यादातर बेरोजगारी और भयंकर गरीबी में कटे । अन्ततोगत्वा 1862 में एक प्रकाशन संस्थान में उसे क्लर्क की नौकरी मिली । ज़ोला ने विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं-में समसामयिक विषयों पर जब लिखना शुरू किया तो उसका उद्देश्य साहित्य की दुनिया में पहचान बनाने के साथ ही कुछ अतिरिक्त कमाई करके जीना सुगम बनाना भी था । वर्ष 1866 तक झोला एक आलोचक, लेखक और पत्रकार के रूप में इतना स्थापित हो चुका था कि पूरी तरह कलम के बूते ही अपनी आजीविका कमा सके । प्रकाशन संस्थान की नौकरी छोड्‌कर अब वह एक पूर्णकालिक लेखक और- फ्री-लांस पत्रकार बन गया ।
    झोला न तो मजदूर आन्दोलन का सिद्धान्तकार था, न ही कोई मजदूर नेता, लेकिन 'जर्मिनल' (उम्मीद है, आएगा वह दिन) उपन्यास में स्वत:सफूर्तता से संगठन की मंजिल तक हड़ताल के विकास का और फिर उसकी पराजय का विस्तृत प्रामाणिक विवरण प्रस्तुत करते हुए उसने आम हड़ताली मजदूरों के मनोविज्ञान का-उनकी चेतना- की, गतिकी का जो चित्रण किया है उससे यह स्पष्ट हो जाता है कि इस मुकाम तक आते-आते उसके कृतित्व में आनुवांशिकता और जैविक नियतत्ववाद का स्थान मूल चालक शक्ति के रूप में नहीं रह गया था । उनका स्थान सामाजिक मनुष्य के बारे में ऐतिहासिक दृष्टिकोण ने ले लिया था । सर्वहारा वर्ग को झोला अब एक ऐसे सामाजिक समूह के रूप में देख रहा था जो अमानवीकृत कर देंने वाली सामाजिक परिस्थितियों की उपज था और जो उन परिस्थितियों का प्रतिरोध करने में, उनके विरुद्ध विद्रोह करने में सक्षम था ।

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