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Uttarkatha : Vol. 1

Uttarkatha : Vol. 1

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  • Pages: 514p
  • Year: 2011, 4th Ed.
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Lokbharti Prakashan
  • ISBN 13: 9788180310447
  •  
    कालजयी उपन्यास यह पथ बंधु था' के बाद भारतीय जीवन का सर्वांगीण परिप्रेक्ष्य प्रस्तुत करनेवाला यह उपन्यास 'उत्तरकथा', आधुनिक कथा-साहित्य की न केवल निष्णात ही बल्कि सम्पूर्ण सांस्कृतिक औपन्यासिक कृति है । स्वरूप का नहीं, प्रयोजन का नाम है महाकाव्य । आज उपन्यास ही महाकाव्य है, एतदर्थ उत्तरकथा' महाकाव्य भी है । देश और काल के विशाल फलक पर चलते साधारण मनुष्य की बड़ी-छोटी परछाइयाँ ही यह संसार है । जब इसी मानवीय संसार की यथार्थता को प्रयोजन-दृष्टि प्राप्त हो जाती है तब मनुष्य सृष्टि मात्र, प्राणि मात्र का प्रतिनिधित्व करनेवाला 'पुरुष' हो जाता है । बड़ी रचनात्मकता कभी भी केवल यथार्थ को ही अन्तिम नहीं मान सकती क्योंकि मनुष्य की रचना उदात्तता के लिए ही हुई है । इस प्रथम खण्ड के सारे साधारण एवं अनाम पात्र कोई बड़ा कार्य नहीं करते परन्तु रोज का तपता हुआ जीवन जीते हैं । यह साधारण उदात्तता प्रकारान्तर से हमें भी पूर्ण बनाती है । दूसरे खण्ड में जब परिवेश का दबाव और अधिक गहरायेगा तब मानवीय विवशता तथा व्यवहार के जल का परिवृत्त और भी सुदूर के तटों तक लहरायेगा । यह शती मनुष्य की परीक्षा की शती रही है जिसमें अनाम लोगों की साधारणता, विश्वास खण्डित एवं क्षत-विक्षत हुए हैं । इस मानवीय जय-पराजय की गाथा से बड़ी कौन-सी भागवत है?

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    Shrinaresh Mehta

    श्रीनरेश मेहता

    जन्म: 15 फरवरी, 1922 को शाजापुर (मालवा) में हुआ।

    शिक्षा: आरम्भिक शिक्षा कई स्थानों पर हुई और बाद में माधव कॉलेज, उज्जैन से इण्टरमीडिएट किया। आपने काशी विश्वविद्यालय से हिन्दी में एम.ए. किया। यहाँ आप पर अपने गुरु श्री केशवप्रसाद मिश्र का गहरा प्रभाव पड़ा। श्री मिश्रजी वेद एवं उपनिषदों के ज्ञाता एवं प्रकाण्ड पंडित थे।

    गतिविधियाँ: उज्जैन में ही आप स्वाधीनता-आन्दोलन (1942) में छात्र-नेता के रूप में सक्रिय हुए। सन् 1948 से 53 तक आप आकाशवाणी के विभिन्न केन्द्रों पर कार्यक्रम अधिकारी रहे। 1955 तक आप वामपंथी राजनीति से भी सम्बद्ध रहे। विद्यार्थी-काल में वाराणसी से प्रकाशित दैनिक ‘आज’ और ‘संसार’ में कार्यरत रहे। सन् 1953 में सरकारी सेवा से मुक्त होकर कुछ समय के लिए गाँधी प्रतिष्ठान से जुड़े और तत्पश्चात् राष्ट्रीय मजदूर कांग्रेस के प्रमुख साप्ताहिक ‘भारतीय श्रमिक’ के प्रधान सम्पादक रहे। साथ ही ‘कृति’ एवं ‘आगामी कल’ जैसी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं का सम्पादन किया।

    पुरस्कार/सम्मान: म.प्र. शासन सम्मान, सारस्वत सम्मान, म.प्र. शासन शिखर सम्मान, उ.प्र. शासन संस्थान सम्मान। 1985 में हिन्दी साहित्य सम्मेलन का मंगला प्रसाद पारितोषिक, केन्द्रीय साहित्य अकादमी पुरस्कार, उ.प्र. शासन का सर्वोच्च ‘भारत भारती’ सम्मान, म.प्र. नाटक लोककला अकादमी द्वारा अलंकृत, म.प्र. हिन्दी साहित्य सम्मेलन का ‘भवभूति अलंकरण’, और सन् 1992 में भारतीय ज्ञानपीठ का सर्वोच्च साहित्य पुरस्कार।

    साहित्य सेवा: सन् 1959 से 85 तक आपने इलाहाबाद में रहकर स्वतन्त्र लेखन किया। 1985 से फरवरी, 1992 तक प्रेमचन्द सृजनपीठ के निदेशक रहे। प्रमुख दैनिक ‘चौथा संसार’ के प्रधान सम्पादक भी रहे। काव्य, खण्डकाव्य, उपन्यास, एकांकी, कहानी, निबन्ध, यात्रा-वृत्तांत आदि विधाओं में 40 से ज्यादा रचनाएँ प्रकाशित।

    निधन: 22 नवम्बर, 2000

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