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Vairagya

Vairagya

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  • Pages: 173p
  • Year: 1999
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 10: 817178707x
  •  
    नई व पुरानी कहानियों का यह संकलन गीतांजलि श्री की' लगभग एक दशक की साहित्यिक यात्रा का परिचय देता है । इसमें वैविध्य है विषय का, अंदाज का । प्रयोग है शिल्प का, भाषा का । और हमेशा ही एक सृजनात्मक साहस है कि यथातथ्यता- 'लिटरैलिटी' -को लाँघते हुए पथ, दृश्य, अनुभव, जमीन तलाशें । अलग-अलग बिंदुओं की टोह लेने की लालसा में नतीजा फटाफट समझाने की कोई हड़बड़ी नहीं । कहीं हमारी जटिल आधुनिकता के आयाम हैं, कहीं मानव-संबंधों की अनुभूतियाँ । कहानियाँ हमारे शाश्वत मुद्‌दों पर भी हैं-मृत्युबोध, जीवन की आस, आत्मीयता की चाह-पर ताजी संवेदना से भरपूर । कभी 'नजर' में हास्य है, कभी फलसफाना दुःख । भाषा की ध्वनियाँ ऐसी हैं कि शायद बहुतों को यहाँ कविता का रस भी मिलेगा । साहित्य-प्रेमियों के लिए एक सार्थक प्रयास ।

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    Geetanjali Shree

    गीतांजलि श्री

    गीतांजलि श्री के चार उपन्यास-माई, हमारा शहर उस बरस, तिरोहित, खाली जगह-और चार कहानी-संग्रह-अनुगूँज, वैराग्य, प्रतिनिधि कहानियां, यहाँ हाथी रहते थे-छप चुके हैं । अंग्रेजी में एक शोध ग्रन्थ और अनेक लेख प्रकाशित हुए हैं ।

    अंग्रेजी में एक शोध ग्रन्थ और अनेक लेख प्रकाशित हुए है ।

    इनकी रचनाओं के अनुवाद भारतीय और यूरोपीय भाषाओँ में हुए हैं ।

    गीतांजलि थियेटर के लिए भी लिखती हैं ।

    फेलोशिप, रेजिडेन्सी, लेक्चर आदि के लिए देश-विदेश की यात्राएँ करती हैं ।

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