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Vidyapati Padavali

Vidyapati Padavali

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  • Pages: 160p
  • Year: 2018, 8th Ed.
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Lokbharti Prakashan
  • ISBN 13: 9788180313660
  •  
    यह 'विद्यापति पदावली' इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि इसका संग्रह बेनीपुरी जी ने किया है । हिन्दी के प्रसिद्ध ललित निबन्धकार बेनीपुरी कवि, कहानीकार ही नहीं गरीबों, पीड़ितों और शोषितों के लिए आजीवन संघर्षरत रहे । ऐसे लेखक के द्वारा विद्यापति की पदावली का संपादन प्रतीकात्मक अर्थ रखता है । पुस्तक के प्रारंभ में बेनीपुरी जी द्वारा लिखी गई भूमिका केवल विश्लेषण और सूचना की दृष्टि से नहीं बल्कि नयी अर्थ मीमांसा की दृष्टि से नयी है । इससे विद्यापति को हम पहले से कुछ अधिक जानने लगते हैं । विद्यापति की यह पदावली शब्दों के अर्थ की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है । बेनीपुरी जी शब्द पारखी थे । उन्होंने इस पदावली में शब्दों के संकेतिक अर्थ को भी स्पष्ट करने का प्रयास किया है जो अन्यत्र दुर्लभ है । विद्यापति के पदों को गाते हुए चैतन्य महाप्रभु समाधिस्थ हो जाते थे । आनन्द कुमार स्वामी को पदावली काव्य कला की दृष्टि से बहुत प्रिय थी । उन्होंने लिखा भी है । उस पदावली का यह प्रस्तुतीकरण अत्यंत उपयोगी है । बेनीपुरी जी विद्यापति को 'हिन्दी का जयदेव' और 'मैथिल कोकिल' कहते थे । उनकी वाणी का बेनीपुरी द्वारा भावित यह संस्करण लोगों को अवश्य रुचेगा । भूमिका में बेनीपुरी ने अपनी चिर- परिचित शैली में पदों की भाषा और कविता माधुरी का जो वर्णन किया है वह तो अन्यत्र दुर्लभ है ही । ' 'राजा की गगनचुंबी अट्टालिका' ' से लेकर गरीबों की टूटी हुई फूस की झोपड़ी तक में विद्यापति के पदों का जो सम्मान है; भूतनाथ के मंदिर और कोहबर घर में पदों की जो प्रतिष्ठा है उसको ध्यान में रखते हुए ही यह पुस्तक बेनीपुरी जी ने सम्पादित की है । इससे विद्यापति और उनकी पदावली की नयी अर्थवत्ता और चमक उजागर होती है । पाठ्यक्रम की दृष्टि से यह सर्वोत्तम है ।

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    Ramvriksha Benipuri

    रामवृक्ष बेनीपुरी

    जन्म: 23 दिसंबर 1899 ई., बेनीपुर, मुजफ्फरपुर (बिहार)। साधारण किसान परिवार। बचपन में ही माता-पिता का निधन। मैट्रिक की पढ़ाई के लिए मुजफ्फरपुर गए। उन्हीं दिनों 1920 के असहयोग आंदोलन में स्कूली शिक्षा छोड़ दी। साहित्य सम्मेलन से विशारद। स्वाधीनता सेनानी के रूप में लगभग नौ साल जेल में रहे। कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार के रूप में बिहार विधान सभा के लिए चुने गए। दिसंबर 1959 में पक्षाघात। लंबी बीमारी। अंततः 6 सितंबर 1968 को निधन।

    संपादित पत्र: तरुण भारत, किसान मित्र, गोलमाल, बालक, युवक, कैदी, लोक-संग्रह, कर्मवीर, योगी, जनता, तूफान, हिमालय, जनवाणी, चुन्नू-मुन्नू तथा नई धारा।

    कृतियाँ: कहानी संग्रह: चिता के फूल। शब्दचित्र-संग्रह: लाल तारा, माटी की मूरतें, गेहँू और गुलाब। उपन्यास: पतितों के देश में, कैदी की पत्नी। ललित-निबंध: सतरंगा इन्द्रधनुष। स्मृति-चित्र: गांधीनामा। कविताएँ: नया आदमी। नाटक: अम्बपाली, सीता की माँ, संघमित्रा, अमर ज्योति, ततागत, सिंहल विजय, शकुंतला, रामराजय, नेत्रदान, गांव का देवता, नया समाज और विजेता। निबंध: हवा पर, नई नारी, वंदे वाणी विनायकौ, अत्र तत्र। आत्मकथात्मक संस्मरण: मुझे याद है, जंजीरें और दीवारें, कुछ मैं कुछ वे। यात्रा साहित्य: पैरों में पंख बाँधकर, उड़ते चलो उड़ते चलो। जीवनी: शिवाजी, विद्यापति, लंगट सिंह, गुरु गोविंद सिंह, रोज लग्ज़ेम्बर्ग, जयप्रकाश, कार्ल मार्क्स। राजनीति: लाल चीन, लाल रूस, रूसी क्रांति।

    इसके अलावा बाल साहित्य की दर्जनों पुस्तकें तथा विद्यापति पदावली और बिहारी सतसई की टीका।

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