• (011) 23274463
  • Help
INR
 
Shopping Cart (0 item)
My Cart

You have no items in your shopping cart.

You're currently on:

Vinayak

Vinayak

Availability: In stock

-
+

Regular Price: Rs. 500

Special Price Rs. 450

10%

  • Pages: 263p
  • Year: 2016, 3rd Ed.
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9788126719921
  •  
    विनायक ...जो भी हो, इसका मतलब यही हुआ कि कुछ देना-पावना बचा था तुम्हारा मेरी तरफ़, जिसे तुम्हें मुझसे वसूल करना ही था। ...दूरबीन लगाकर देखा, तुम खासे फल-फूल रहे हो। सेवा-निवृत्ति की सरहद पर हो, फिर भी एक और लम्बी छलाँग लगाने को तैयार बैठे हो। ...इस सबके बीच तुम्हें घर की याद जैसी पिछड़ी और बासी-बूसी चिन्ता क्यों सताने लगी - मेरी समझ से बाहर है। देखता हूँ, तुम्हारे भीतर का वह कौतुकी-खिलंदड़ा बीनू अभी भी ज़िन्दा है। अभी भी अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहा। ...उफ़! ऐसी भरी-पूरी और फलती-फूलती गिरस्ती के बीचोबीच यह कैसा बवंडर बो दिया तुमने! अजीब भँवर में डाल दिया है तुमने मुझे विनायक! तुम मेरे काबू से बाहर हुए जा रहे हो। मैं क्या करूँ तुम्हारा अब? मेरी स्मृति भी मेरा साथ नहीं दे रही। ओह, अब याद आया। स्मृति नहीं, ‘प्रतिस्मृति’। जानते हो यह क्या होती है? ...पर, विनायक! अब यह मेरी जिम्मेदारी है, तुम्हारी नहीं। तुम्हें मैं जहाँ तक देख-सुन सकता था, दिखा-सुना चुका। जितनी दूर तक तुम्हारा साथ दे सकता था, दे चुका। अब तुम अपनी राह चलने को स्वतंत्र हो, और मैं अपनी। यह एक ऐसा उपन्यास है जिसे इस लेखक के ही सुप्रसिद्ध और पहले-पहले उपन्यास ‘गोबरगणेश’ के नायक की उत्तरकथा की तरह भी पढ़ा जा सकता है और अपने-आप में मुकम्मल स्वतंत्र कृति की तरह भी। हाँ, जैसे उस विनायक का, वैसे ही इस विनायक का भी जिया-भोगा सबकुछ संवेदनशील पाठकों को खुद अपनी जीवनानुभूति के क़रीब लगेगा: क्योंकि, यह किसी सिद्धिविनायक की नहीं, हमारे-आपके जैसे ही हर असिद्ध की व्यथा-कथा है, जिसमें अन्तर्द्वन्द्व और त्रास ही नहीं, उमंग और उल्लास भी कुछ कम जगह नहीं घेरतेे। चाहे चरितनायक हो, चाहे लच्छू-चन्दू-त्रिभुवन और हरीशनारायण सरीखे उसके नए-पुराने संगी-साथी हों, चाहे स्त्री-पुरुष सम्बन्धों की अक्षय ऊष्मा और दुर्निवार्य उलझनों को साकार करनेवाले चरित्र - मालती, मार्गरेट और शकुन्तला उर्फ मिसेज़ दुबे हों - सभी के इस आख्यान में घटित होने की लय हमारे सामूहिक और व्यक्तिगत जीने की लय से अभिन्न है। लय, जो जितनी जीने के ‘सेंसेशन’ की है, उतनी ही सोचने-महसूसने और उस सोचने-महसूसने को कहने की ज़िन्दा हरकतों की भी। अन्तर्बाह्य जीवन की सनसनी से भरपूर यह उपन्यास अपने ही ढंग से, अपने ही सुर-ताल में जीवन के अर्थ की तलाश में भी पड़ता है: अपने ही जिये-भोगे हुए का भरपूर दबाव उसे उस ओर अनिवार्यतः ठेलता है। जीवन क्या किसी का भी, महज़ सीधी लकीर नहीं, एक वृत्त, बल्कि वर्तुल है जो ‘अन्त’ को ‘आरम्भ’ से मिला के ही पूरा होता है? यह भी महज़ संयोग नहीं, कि उपन्यास का आरम्भ ‘माई डियर बीनू’ को लिखी गई एक चिट्ठी और एक खुशबू से होता है और उपसंहार स्वयं इस चरितनायक को उसके रचयिता के सीधे सम्बोधन और ‘प्रतिस्मृति’ से।

    Customer Reviews

    There are no customer reviews yet.

    Write Your Own Review

    Ramesh Chandra Shah

    जन्म : वैशाखी त्रयोदशी, 1937 अल्मोड़ा, उत्तरप्रदेश।

    शिक्षा : अल्मोड़ा  तथा  प्रयाग विश्वविद्यालय में।

    प्रकाशित कृतित्व—काव्य : कछुए की पीठ पर, हरिश्चन्द्र आओ, नदी भागती आई, प्यारे मुचकुन्द को, चाक पर समय तथा देखते हैं शब्द भी अपना समय के अतिरिक्त तीन बाल कविता-संग्रह। उपन्यास : गोबरगणेश, कि़स्सा ग़ुलाम, पूर्वापर, आखि़री दिन, पुनर्वास। छठा उपन्यास 'विभूतिबाबू की आत्मकथा’ शीघ्र प्रकाश्य। 'कि़स्सा ग़ुलाम’ आठ भारतीय भाषाओं में अनूदित। कहानी-संग्रह : जंगल में आग, मुहल्ले का रावण, मानपत्र, प्रतिनिधि कहानियाँ (राजकमल सीरीज़); थिएटर। निबन्ध-संग्रह : शैतान के बहाने, रचना के बदले, पढ़ते-पढ़ते, सबद निरन्तर, आड़ू का पेड़, स्वधर्म और कालगति तथा स्वाधीन इस देश में। यात्रा-वृत्तान्त : बहुवचन में दो यात्रा-वृत्तान्त संकलित तथा एक लम्बी छाँह। अंग्रेज़ी में : येट्स एंड एलियट : पर्सपैक्टिव्ज़ ऑन इंडिया, जयशंकर प्रसाद तथा टेमेनोए अकादमी लन्दन द्वारा चार व्याख्यानों की पुस्तिका प्रकाशित।

    सम्मान : सर्जनात्मक उपलब्धियों के लिए मध्यप्रदेश शासन, संस्कृति विभाग का शिखर-सम्मान, कविता-संग्रह नदी भागती आई के लिए मध्यप्रदेश साहित्य परिषद् का भवानीप्रसाद मिश्र पुरस्कार, उपन्यास पूर्वापर के लिए भारतीय भाषा परिषद्, कलकत्ता तथा निबन्ध-संग्रह स्वधर्म और कालगति के लिए उत्तरप्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा सम्मानित।

    सम्प्रति : भोपाल के हमीदिया कॉलेज से अंग्रेज़ी विभाग के प्रोफ़ेसर-विभागाध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त होने के उपरान्त निराला सृजनपीठ, भोपाल के निदेशक पद पर कार्यरत।

    सम्पर्क : निराला  सृजनपीठ  सी-165/1, प्रोफ़ेसर्स कालोनी, भोपाल-462 002

    loading...
      • Sarthak An Imprint of Rajkamal Prakshan
      • Chahak An Imprint of Rajkamal Prakshan
      • Funda An Imprint of Radhakrishna
      • Korak An Imprint of Radhakrishna

    Location

    Address:1-B, Netaji Subhash Marg,
    Daryaganj, New Delhi-02

    Mail to: info@rajkamalprakashan.com

    Phone: +91 11 2327 4463/2328 8769

    Fax: +91 11 2327 8144