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Vivaksha

Vivaksha

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  • Pages: 374p
  • Year: 2006
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 10: 812671199x
  •  
    अपनी सक्रियता, सृजनशीलता, विचारोत्तेजना और मुखरता से हिन्दी साहित्य के परिदृश्य में लगातार एक अलग उपस्थिति बने अशोक वाजपेयी ने लगभग पचास वर्ष पहले कविता-प्रवेश किया था। इस दौरान हिन्दी कविता में आए परिवर्तनों और आन्दोलनों से अपने को सुपरिचित रखते हुए भी, उनकी अपनी अलग राह रही है जिस पर वे लगभग ज़िद कर चलते रहे हैं। अपनी कविता-यात्रा को ‘शब्द के साथ प्रयोगों की प्रेमकथा’ बतानेवाले वे एक ऐसे कवि हैं जिनमें जीवनासक्ति और शब्दासक्ति के बीच कोई द्वैत नहीं है। अपने समय और समाज की जटिल सच्चाइयों के प्रति सजग और संवेदनशील रहते हुए यह एक ऐसी कविता है जिसमें निजी और सामाजिक को निरन्तर संगुंफित किया गया है। कभी साक्षी, कभी सहचर, कभी हिस्सेदार यह कवि अपने समय में अन्तर्निहित दूसरे समयों को भी कविता में विन्यस्त करने की चेष्टा करता रहा है। अब तक प्रकाशित अपने बारह कविता-संग्रहों में से लगभग दो सौ कविताएँ इस संचयन के लिए स्वयं अशोक वाजपेयी ने चुनी हैं। प्रेम, मृत्यु, दुनिया, शब्द, पूर्वज, कलाएँ, घर-पड़ोस आदि थीमों के इर्द-गिर्द बुना हुआ यह संकलन अशोक वाजपेयी के श्रेष्ठ काव्य के आस्वादन का एक नया अवसर भर नहीं जुटाता, वह इस दौरान लिखी गई हिन्दी कविता के कुछ परिष्कृत-जटिल पर सम्प्रेषणीय अंश को भी एकत्र करता है। कवि के पैंसठ वर्ष की आयु पूरी करने पर यह संचयन विशेष रूप से प्रकाशित है। भूमिका पोलिश विदुषी रेनाता चेकाल्स्का ने लिखी है जो कई बरसों से अशोक वाजपेयी की कविता का अध्ययन करती रही हैं।

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    Ashok Vajpeyi

    1970 में अपने निबंध-संग्रह 'फ़िलहाल' से हिंदी में आलोचना-प्रवेश करनेवाले कवि-आलोचक अशोक वाजपेयी लगभग एक अधसदी से कविता, साहित्य, संस्कृति, संगीत, रूपंकर कलाओं आदि पर हिंदी और अंग्रेजी में आलोचना लिखते रहे हैं ! उन्होंने आलोचना की भाषा को नई ताजगी और सूक्ष्मता देने के साथ-साथ उसे सामाजिक संवाद का हिस्सा बनाने में सार्थक भूमिका निभाई है !

    उनकी प्रकाशित आलोचना पुस्तकों में 'फ़िलहाल', 'कुछ पूर्वग्रह', 'कविता का गल्प', 'सीढियां शुरू हो गई हैं', 'कभी-कभार', 'यहाँ से वहां' , 'कुछ खोजते हुए', 'पुनर्भव', 'समय से बाहर' आदि शामिल हैं !

    अशोक वाजपेयी को साहित्य अकादेमी पुरस्कार (जो उन्हें 1994 में मिला उसे बढती असहिष्णुता के विरोध में 2015 में लौटा दिया), दयावती मोदी कविशेखर सम्मान, कबीर सम्मान, समन्वय भाषा सम्मान आदि से अलंकृत किया गया है ! फ्रेंच और पोलिश सरकारों ने उन्हें उच्च नागरिक सम्मान दिए हैं ! 2011 में उन्होंने उत्तर प्रदेश सर्कार का भारत भारती पुरस्कार विरोधस्वरुप स्वीकार नहीं किया था !

    वे 35 वर्ष भारतीय प्रशासनिक सेवा में रहे ! महात्मा गाँधी अन्तराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के सस्थापक-कुलपति, केन्द्रीय ललित कला अकादेमी के अध्यक्ष रहे हैं और इन दिनों रजा फाउंडेशन के प्रबंध-न्यासी हैं ! वे भारत भवन न्यास के संस्थापक न्यासी सचिव और अध्यक्ष भी रहे हैं ! हिंदी आलोचना की पत्रिका 'पूर्वग्रह' का उन्होंने लगभग 16 वर्षों तक संपादन किया !

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