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Aatmbodh Ke Ayam

Aatmbodh Ke Ayam

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  • Pages: 192
  • Year: 2018, 1st Ed.
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Lokbharti Prakashan
  • ISBN 13: 9789386863836
  •  
    ज्ञान मनुष्य के लिए तभी सहायक होता है, जब वह अपने साथ-साथ समाज को ऊँचा उठाने का सामर्ध्व रखता हो और ब्रह्मज्ञान की सार्थकता तब होती है' हैं जब साधक अपने-आपको इतनी ऊँचाई तक ले जाये कि वह त्रिकालज्ञ बनाकर समाज को आत्मकल्याण के मार्ग में ले जाये । ब्रह्मज्ञानी के लोक और परलोक दोनों सुन्दर अतर सुखद हो जाते हैं, किन्तु ब्रह्मज्ञान प्राप्त करना अत्यन्त दुष्कर कार्य है । यह अध्यात्म के रास्ते चलकर भक्ति और रोग के धर्म क्रो स्वीकृति प्रदान करके, कठिन साधना द्वारा प्राप्त किया जा सकता । अनाहऩनाद की साधना ऐसी ही कठिन तपस्या है जिसे स्मृति शर्मा ने अपने अगम्य कार्य निष्ठा व अटूट मेहनत से पूर्ण किया । अनाहतनाद से आज के संगीत का जन्य हुआ है । 'आत्मबोध के आयाम’ रचना संगीन एवं अध्यात्म के पाठकों का पथ प्रशस्त करेगी । सुधीज़न इससे निश्चित ही लाभान्वित होंगे । भारतीय संगीत केबल मनोविनोद का साधन न होकर आत्मा को परमात्मा से जोड़ने के भक्ति मार्ग का परम कल्याणकारी साधन है । संगीत के "अनाहतनाद' तत्व पर लिखतें हुए साधना के आन्तरिक स्वरूप क्रो जाना । जीवन के धागे क्रो गठान से मुक्त करते ही नाद स्वरूप ब्रहा की प्राप्ति हो जायेगी और यहीं से 'अनाहतनाद' के रहस्य की परतें खुलना शुरू हो जायेगी, जिससे जीवात्मा से महात्मा, महात्मा से देवात्मा और अन्त में देवात्मा से परमात्मा तक के पहुंच का मार्ग खुल जायेगा |

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    Smriti Sharma

    रचनात्मक व सृजनात्मक व्यक्तित्व की धनी, अद्वितीय प्रतिभा से सम्पन्न, संगीत साधिका स्मृति शर्मा का जन्य 30 मई सन् 1980 को मध्यप्रदेश स्थित सतना जिला के ग्राम किरहाई (अमरपाटन) में हुआ ।

    प्राथमिक शिक्षा गॉव में माध्यमिक एवं उच्च शिक्षा रीवा में सम्पन्न हुई । वर्ष 2004 में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा संचालित नेट परीक्षा उत्तीर्ण कर ठाकुर रणमत सिंह महाविद्यालय रीवा में अतिधि आचार्य के रूप में अध्यापन कार्य करते हुए "भारतीय संगीत में अनाहतनाद” विषय पर शोध किया । इसी काल खण्ड में कैंसर जैसी घातक बीमारी की वेदना झेलते हुए 26 अप्रैल, 2012 को संसार को अलविदा कह दिया । 32 वर्ष से कम समय के जीवन में अनुभव में आये आत्मा के गूढ़ रहस्यों की तहों को इस पुस्तक में खोला है ।

    मेरे-तेंरे में उलझा मन इस सत्य को नहीं जानता कि नाशवान शरीर के पीछे निराकार अविनाशी आत्मा है, इसे जानने के लिए इन्होंने संगीत और साहित्य, विज्ञान और दर्शन, ज्ञान और भक्ति तथा धर्म और कर्म का संयोजन किया । इन्होंने स्थानीय एवं राट्रीय स्तर की कईं सामाजिक एवं शैक्षणिक परिचर्चाओं में हिस्सा लिया । अवधेश प्रताप सिह विश्वविद्यालय रीवा, द्वारा इनके शोध पर डॉक्टर आँफ फिलासफी की उपाधि से विभूषित किया गया ।

     

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