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Awara Sajde

Awara Sajde

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  • Pages: 224p
  • Year: 2019, 4th Ed.
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Lokbharti Prakashan
  • ISBN 13: 9788180312861
  •  
    ‘आवारा सज्दे’ मेरा तीसरा काव्य–संकलन है, जो पहली बार उर्दू में 1973 में छपा था । यह मेरी नयी नज्“मों का संकलन है । भारत में इसका स्वागत मेरी आशाओं से भी बढ़कर हुआ । इसकी कुछ नज्“मों को तोड़–मरोड़कर, उनको अपनी तरफ’ से गलत–सलत मानी पहनाकर, कुछ फिरकापरस्तों ने शायर को बदनाम करने की बदबख़्त कोशिश की, लेकिन रुस्वा हुई उनकी अपनी समझ! पढ़े–लिखे वर्ग ने इसे हाथों–हाथ लिया । इसी वजह से इस संस्करण में तमाम नयी नज्में और ग“ज“लें शामिल करने से अपने को रोक न सका । मैं बारह–तेरह बरस की उम्र से शेर कहने लगा था । मेरा माहौल शायराना था । घर में उर्दू–फारसी के सभी नामवर शायरों के काव्य–संकलन मौजूद थे । खास–खास मौको पर घर में क’सीदे की महफि’लें होती थीं । कभी–कभार तरही–मुशायरे भी होते । आजकल छ:–छ: महीने मुझसे एक मिसरा भी नहीं होता । उस ज“माने में रोज“ ही कुछ न कुछ लिख लिया करता था । कोई नौहा, कोई सलाम, कोई गजल । उस ज“माने की सब चीजें अगर समेटकर रखने लायक’ न थीं, तो मिटा देने लायक’ भी नहीं । मुझे उनकी बर्बादी का अफसोस भी नहीं है । इसलिए कि उस समय तक न मैं शायरी की सामाजिक जिम्मेदारी से वाकिफ’ हुआ था, न शे’र की अच्छाई–बुराई से । 1936 में प्रगतिशील लेखक संघ के जन्म लेने और उसके असर से पैदा होने वाले अदब ने मुझे बहुत जल्द अपनी पकड़ में ले लिया । मैंने इस नये साहित्यिक आन्दोलन और कम्युनिस्ट पार्टी से सम्बद्ध होकर जो कुछ कहा, उनसे मेरे तीन काव्य–संकलन तैयार हुए । प्रस्तुत संकलन देवनागरी लिपि में मेरा पहला प्रकाशन है । यह मेरी कविताओं का प्रतिनिधित्व करता है । इसमें ‘झंकार’ की चुनी हुई चीजें भी हैं और ‘आखिरे–शब’ की भी । ‘आवारा सज्दे’ मुकम्मल है । मेरी नज्मों और गजलों के इस भरपूर संकलन के जरिए मेरे दिल की धड़कन उन लोगों तक पहुँचती है, जिनके लिए वह अब तक अजनबी थी ।

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    Kaifi Azmi

    जन्म: ज़िला आज़मगढ़ (उत्तर प्रदेश) के गाँव मजवाँ में एक शिया ज़मींदार परिवार में। तारीख़ या साल ख्शुद क़ैफ़ी साहब को याद नहीं था कोई और कैसे बताए! फिर भी, उनकी अपनी तहरीर के बल पर क़यास किया जा सकता है कि वे 1920 के साल-दो साल उधर या इधर पैदा हुए होंगे।

    शिक्षा: इलाहाबाद और लखनऊ में हुई। सुल्तानुल- मदारिस, लखनऊ में आपको मौलवी बनाने के लिए भरती कराया गया था, लेकिन आप कुछ और ही बन गए। अफ़सानानिगार आयशा सिद्दीक़ी के शब्दों में, ‘क़ैफ़ी साहब को वहाँ इसलिए दाख़िल किया गया था कि फ़ातिहा पढ़ना सीखंेगे मगर वहाँ क़ैफ़ी साहब मज़हब पर फ़ातिहा पढ़कर निकल आए।’

    11 साल की उम्र में अपनी पहली ग़ज़ल कही और एक मुशायरे में पढ़ी। उसके बाद से आपका शे’री सफ़र लगातार जारी रहा।

    प्रकाशन: झंकार (1943), आख़िर-शब (1947), आवारा सज्दे (1973), 1974 में मेरी आवाज़ सुनो (फि़ल्मी गीतों का संकलन) और 1992 में सरमाया (प्रतिनिधि रचनाओं का चयन)।

    सम्मान: उत्तर प्रदेश उर्दू अकादेमी और साहित्य अकादेमी का पुरस्कार, सोवियत भूमि नेहरू पुरस्कार, अफ्रो-एशियाई लेखक संघ का लोटस पुरस्कार, ग़ालिब पुरस्कार और हिन्दी अकादेमी, दिल्ली का शताब्दी सम्मान।

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