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Guru Nanak Dev : Jivan Aur Darshan

Guru Nanak Dev : Jivan Aur Darshan

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  • Pages: 295p
  • Year: 2017, 3rd Ed.
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Lokbharti Prakashan
  • ISBN 13: 9788180314667
  •  
    डॉ. जयराम मिश्र ने इस पुस्तक में गुरुमत दर्शन को गुरुनानक देव जी की जीवन-घटनाओं द्वारा प्रकट किया है । स्थान-स्थान पर गुरुदेव के उच्चारित शब्दों की व्याख्या की गई है, ताकि साधारण पाठक गुरुमत सम्बन्धी ठीक-ठीक परिचय प्राप्त कर सकें । घटनाओं के आन्तरिक तथ्य को लेखक ने विस्तारपूर्वक प्रकट किया है ।... डॉ. मिश्र की लेखनी में बल है । उनका गुरुमत का शान विषद् और निर्दोष है ।.. .इस पुस्तक का स्रोत चाहे हमारी जन्म साखियाँ क्यों न हों, परन्तु जिस सुयोग्य ढंग से घटनाओं का वर्णन किया गया है, वह लेखक की मौलिकता का परिचायक है ।.. .पुस्तक के अन्त में दो अध्याय व्यक्तित्व एवं दर्शन सम्बन्धी अलग दिये गये हैं ।... मैं इस मनोहर रचना के लिए डी. जयराम मिश्र को बधाई देता हूँ और आशा करता हूँ कि यह रचना हिन्दी पाठकों के लिये कल्याणकारी सिद्ध होगी ।... डॉ. सुरेन्द्रसिंह कोहली वरिष्ठ प्रोफेसर एवं अध्यक्ष पंजाबी विभाग, पंजाब विश्वविद्यालय चण्डीगढ़

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    Jaishankar Sundri

    जन्म 30 जनवरी, 1889 विसनगर, गुजरात के श्रीमाली भोजक परिवार में। संगीत का संस्कार उनको बचपन में ही अपने परिवार से मिला। बचपन में देखे खेल भवाई, कथा नल दमयंती, चित्रकथा इलाची कुमार और राजा हरिश्चन्द्र जैसे नाटकों का उनके बाल-मन पर गहरा प्रभाव पड़ा। मात्र नौ वर्ष की उम्र में माता-पिता ने उनको बाल कलाकारों की खोज में आये नाटक मंडली के कार्यकर्ताओं के साथ कलकत्ता भेज दिया, जहाँ पारसी नाटक मंडली के आद्यगुरु दादाभाई रतनजी ठूँठी के कड़े अनुशासन में गीत-संगीत और उर्दू भाषा की शिक्षा पाई। उन दिनों ये उनकी ठनठनिया नाटक मंडली में सखियों की भूमिका किया करते थे।

    सन् 1901 में वे मुम्बई-गुजराती नाटक मंडली से जुड़े और गेटी थियेटर में प्रवेश किया जो उनके अभिनय-जीवन की महत्त्वपूर्ण घटना बना। अपने पहले नाटक सौभाग्य सुन्दरी में सुन्दरी की भूमिका की। यह भूमिका इतनी प्रसिद्ध हुई कि ‘सुन्दरी’ नाम सदा के लिए उनके नाम के साथ जुड़ गया। यहाँ आपने अपने रंगमंच जीवन में लगभग पैंतीस स्त्री- भूमिकाएँ अभिनीत कीं जो भारतीय रंगमंच के इतिहास का यादगार अभिनय-अध्याय कही जा सकती हैं। सन् 1932 में मुम्बई-गुजराती मंडली से संन्यास के बाद भी उनकी रंगयात्रा जारी रही। अहमदाबाद में नटमंडल बनाकर बतौर निर्देशक, आधुनिक नाटकों का निर्देशन और अभिनेताओं को प्रशिक्षण देने का उनका कार्य अनवरत चलता रहा।

    सन् 1971 में आपके विशिष्ट गुणों के लिए आपको पर्भिंूषण से सम्मानित किया गया। 

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