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But Jab Bolte Hain

But Jab Bolte Hain

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  • Pages: 168
  • Year: 2015, 1st Ed.
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Lokbharti Prakashan
  • ISBN 13: 9789352210077
  •  
    कथाकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता सुधा अरोड़ा हमारे समय का एक जाना-पहचाना नाम है ! लेखन इनके लिए जुनून तो है ही मिशन भी है ! सुधा जी के लेखन में निरंतर ताजगी दिखाई देती है ! समकालीन मुद्दों पर उनके लेखन की पक्षधरता अचंभित करती है ! बुत जब बोलते है उनकी ताजा कहानियों को संकलन है ! सुधा अरोड़ा की कहानियां शाश्वत मूल्यों के साथ-साथ समकालीन परिस्थिति से संवाद भी करती चलती हैं और अपने को निरंतर बदलते समाज से जोड़े रखती है-कुरीतियों और अवमूल्यन के खिलाफ बेबाक-बयानी करती हुई और सच समर्थन में अपनी आवाज बुलंद करती हुई ! इन कहानियों के पत्र विविध वर्गों से आते हैं ! यहाँ स्त्रियों के अलावा मूक कामगार भी है, मौन बालश्रमिक भी और जटिल सामाजिक विसंगारियों से जूझती बुजुर्ग और युवा स्त्रियाँ भी ! सुधा अरोड़ा की कहानियां देह-विमर्श की तीखी आवाजों के बीच स्त्री जीवन के किसी मार्मिक हिस्से को अभिव्यक्त करती कर्णप्रिय लोकगीत-सी लगती हैं ! इनका उद्देश्य घरेलू-हिंसा और पुरुष की व्यावहारिक व् मानसिक क्रूरता के आघात झेल कर ठूंठ हो चुके स्त्री मन में फिर से हरितिमा अंखुआने और जीवन की कोमलता उभारने की संवेदना का सिंचन करना है ! उधडा हुआ स्वेटर कहानी को खुले मन से मिली पाठकों की स्वीकृति साबित करती है कि ऐसी संवेदनात्मक कहानोयों का लिखा जाना कितना जरूरी है ! इन कहानियों में लेखिका दर्दमंद स्त्रियों की दरदिया बनकर अगर एक हाथ से उनके घाव खोलती है तो दूसरे हाथ से उन्हें आत्मसाक्षात्कार के अस्त्र भी थमाती है जिससे ये स्त्रियाँ भावनात्मक आघात और संत्रास से टूटती नहीं बल्कि मजबूत बनती हैं ! राग देह मल्हार की बेनू और भागमती पंडाइन का उपवास की भागमती ऐसी ही स्त्रियाँ हैं जिनका स्वर व्यंग्यात्मक और चुटीला होते हुए भी संवेदना को संजोये रहता है ! अपने समय के साथ मुठभेड़ में हमेशा अगुआ रही इस वरिष्ठ लेखिका के नये संकलन का पाठकों की दुनिया में स्वागत होगा, इस उम्मीद के साथ....

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    Sudha Arora

    सातवें दशक की चर्चित कथाकार सुधा अरोड़ा का जन्म 4 अक्टूबर, 1946 को लाहौर में हुआ। कलकत्ता विश्वविद्यालय से 1967 में हिन्दी साहित्य में एम.ए. तथा बी.ए. ऑनर्स में दो बार स्वर्णपदक प्राप्त करनेवाली सुधा जी ने 1969 से 1971 तक कलकत्ता के दो डिग्री कॉलेजों में अध्यापन-कार्य किया।

    उनकी पहली कहानी 'मरी हुई चीज़’ 'ज्ञानोदय’—सितम्बर 1965 में और पहला कहानी-संग्रह 'बगैर तराशे हुए’ 1967 में प्रकाशित हुआ। 1991 में हेल्प सलाहकार केन्द्र, मुम्बई से जुड़ने के बाद वे सामाजिक कार्यों के प्रति समर्पित रहीं।

    अब तक उनके बारह कहानी-संकलन—जिनमें 'महानगर की मैथिली’, 'काला शुक्रवार’ और 'रहोगी तुम वही’ चर्चित रहे हैं, एक कविता-संकलन तथा एक उपन्यास के अतिरिक्त वैचारिक लेखों की दो किताबें 'आम औरत : जि़न्दा सवाल’ और 'एक औरत की नोटबुक’ प्रकाशित हो चुकी हैं। उन्होंने बड़े पैमाने पर अनुवाद, सम्पादन और स्तम्भ-लेखन भी किया है तथा भंवरीदेवी पर बनी फि़ल्म 'बवंडर’ की पटकथा लिखी है।

    कहानियाँ लगभग सभी भारतीय भाषाओं के अतिरिक्त अंग्रेज़ी, फ्रेंच, पोलिश, चेक, जापानी, डच, जर्मन, इतालवी तथा ताजिकी भाषाओं में अनूदित और इन भाषाओं के संकलनों में प्रकाशित।

    1977-78 में पाक्षिक 'सारिका’ में 'आम औरत : जि़न्दा सवाल’, 1997-98 में दैनिक अखबार 'जनसत्ता’ में साप्ताहिक स्तम्भ 'वामा’, 2004 से 2009 तक 'कथादेश’ में 'औरत की दुनिया’ और 2013 से 'राख में दबी चिनगारी’—उनके स्तम्भ ने साहित्यिक परिदृश्य पर अपनी ख़ास जगह बनाई है।

    1978 में उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान का विशेष पुरस्कार, 2008 में 'भारत निर्माण सम्मान’, 2010 में 'प्रियदर्शिनी पुरस्कार’, 2011 में 'वीमेन्स अचीवर अवॉर्ड’, 2012 में 'महाराष्ट्र राज्य हिन्दी अकादमी सम्मान’ और 2014 में 'वाग्मणि सम्मान’ आदि से सम्मानित।

    सम्प्रति : मुम्बई में स्वतंत्र लेखन।

    सम्पर्क : 1702, सॉलिटेयर, हीरानन्दानी गार्डेन्स, पवई, मुम्बई-400 076

    फोन : 022 4005 7872

    sudhaarora@gmail.com

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