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Jahaj Ka Panchhi

Jahaj Ka Panchhi

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  • Pages: 332p
  • Year: 2008
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Lokbharti Prakashan
  • ISBN 13: 9788180312649
  •  
    श्री इलाचन्द्र जोशी हिन्दी के अत्यन्त प्रतिष्ठित उपन्यासकार थे । उनके प्राय: सभी उपन्यासों का गठन हमारे मध्यवर्गीय समाज के जिन पात्रों के आधार पर हुआ है, वे मनोवैज्ञानिक सार्थकता के लिए सर्वथा अद्वितीय है । 'जहाज का पक्षी' एक ऐसे मध्यवर्गीय नवयुवक के परिस्थिति-प्रताड़ित जीवन की कहानी है, जो कलकत्ता के विषमताजनित घेरे में फँसकर इधर-उधर भटकने को विवश हो जाता है, किन्तु उसकी बौद्धिक चेतना उसे रह-रह कर नित-नूतन पथ अपनाने को प्रेरित करती है । ऐसा कौन-सा काम है, जो उसने अपने अन्तस की सन्तुष्टि के लिए न अपनाया हो । जीवन की उदात्तता का पक्षपाती होते हुए भी वह 'जहाज का पंछी' के समान इत-उत भटककर फिर अपने उसी उद्दिष्ट पथ का राही बन जाता है, जिसे अपनाने की साध वह अपने अन्तर्मन में सँजोये हुए था । 'जहाज का पंछी' में आज के सुशिक्षित किन्तु महत्वाकाँक्षी तथा बौद्धिक चेतना से आक्रान्त बहुत से नवयुवक अपनी ही जीवनकथा अंकित पाएँगे । यह एक दर्पण है, जिसमें हम अपने तरुण वर्ग और नागरिक जीवन की झाँकी पा सकते हैं ।

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    Ilachandra Joshi

    इलाचंद्र जोश

    जन्म : 13 दिसम्बर, 1902 ई. अल्मोड़ा में एक प्रतिष्ठित मध्यवर्गीय परिवार में हुआ । अल्मोड़ा जैसे

    प्राकृतिक रमणीय स्थान ने इनके व्यक्तित्व पर असर डाला है ।

    गतिविधियाँ : सन् 1921 में शरद बाबू से इनकी भेंट । 'चाँद' के सहयोगी सम्पादक, सन् 1929 में

    ‘सुधा’ का सम्पादन । पहला उपन्यास जो 1927 ई. में लिखा गया था, सन् 1929 में प्रकाशित हुआ ।

    'कोलकाता समाचार’, 'चाँद', ‘विश्वचाणी', ‘सुधा’, ‘सम्मेलन-पत्रिका', 'संगम', 'धर्मयुद्ध'

    और 'साहित्यकार' जैसी पत्रिकाओं के सम्पादन से भी जुडे रहे ।

    प्रमुख रचनाएँ

    उपन्यास : लज्जा, संन्यासी, पर्दे की रानी, प्रेत और छाया, निर्वासित, मुक्तिपथ, सुबह के भूले,

    जिप्सी, जहाज का पंछी, भूत का भविष्य, ऋतुचक्र ।

    कहानी : धूपरेखा, दीवाली और होली, रोमांटिक छाया, आहुति, खँडहर की आत्माएँ, डायरी के नीरस पृष्ठ, कटीले फूल लजीले काँटे ।

    समालोचना तथा निबन्ध : साहित्य सर्जना, विवेचना, विश्लेषण, साहित्य चिंतन, शरतचंद्र-व्यक्ति और कलाकार, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, देखा-परखा।

    पुरस्कार : उत्तर प्रदेश शासन द्वारा ‘ऋतुचक्र' उपन्यास पर प्रेमचन्द पुरस्कार 1969-70 ईं., राज्य साहित्यिक पुरस्कार उत्तर प्रदेश शासन द्वारा 1974-75 ईं. विशिष्ट पुरस्कार उत्तर प्रदेश शासन द्वारा 1976 -77, साहित्य वाचस्पति की उपाधि 1979 ईं. ।

    निधन : सन् 1982 ईं. ।

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