• (011) 23274463
  • Help
INR
 
Shopping Cart (0 item)
My Cart

You have no items in your shopping cart.

Viparyast

Viparyast

Availability: Out of stock

Regular Price: Rs. 75

Special Price Rs. 67

11%

  • Pages: 168p
  • Year: 2007
  • Binding:  Paperback
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Lokbharti Prakashan
  • ISBN 13: 9788180311390
  •  
    मैंने जीवन के किसी पहलू को ठीक से समझा नहीं था, जिस तरह कि अब भी नहीं समझ पाता हूँ कि जीवन के चलने की दिशा क्या है। उसका क्या अपना कोई बना-बनाया रास्ता है, जिससे होकर वह हमें खींचकर ले जाता है? याकि हमीं अपने पथ का निर्माण करते हैं और आगे बढ़ते जाते हैं? फिर ऐसा क्यों होता है कि हम आगे या पीछे की किसी दिशा को एक-दूसरे से नहीं मिला पाते हैं? वे दिन तब शाश्वत क्यों नहीं हो सके जबकि मैंने पिताजी को पराजित कर दिया था और उसके बाद सावन का वह दिन शाश्वत क्यों नहीं हो सका, जिस सावन के शुक्ल पक्ष की एक रात खुकु को ब्याहकर मैं इस घर में ले आया था? तब मैं पिताजी से हार-जीत का खेल भी भूल चुका था। पिताजी भी भूल चुके थे। उन बातों को क्या कहा जाता है—मधुर? उससे भी कुछ बढ़कर कोई चीज। क्योंकि 'मधुर' मेरी समझ में नहीं आता है। समझा यही था कि जीवन जीने में कितना सुख है! —इसी पुस्तक से

    Customer Reviews

    There are no customer reviews yet.

    Write Your Own Review

    loading...
      • Sarthak An Imprint of Rajkamal Prakshan
      • Chahak An Imprint of Rajkamal Prakshan
      • Funda An Imprint of Radhakrishna
      • Korak An Imprint of Radhakrishna
    Location

    Address:1-B, Netaji Subhash Marg,
    Daryaganj, New Delhi-02

    Mail to: info@rajkamalprakashan.com

    Phone: +91 11 2327 4463/2328 8769

    Fax: +91 11 2327 8144