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Sati Maiya Ka Chaura

Sati Maiya Ka Chaura

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  • Pages: 487p
  • Year: 2013
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Lokbharti Prakashan
  • ISBN 13: 9788180317514
  •  
    सती मैया का चौरा में भैरवप्रसाद गुप्त गाँवों की मुक्ति का सवाल उठाते हैं। वे सांप्रदायिक सद्भाव के लिए किए जाने वाले संघर्ष को भी विस्तारपूर्वक अंकित करते हैं। उपन्यास की कहानी दो संप्रदायों के किशोरों—मुन्नी और मन्ने को केन्द्र में रखकर विकसित होती है। मन्ने गाँव के जमींदार का लड़का है, जबकि मुन्नी एक साधारण हैसियत वाले वैश्य परिवार से है। उनके किशोर जीवन के चित्र सांप्रदायिक कट्टरता के विरुद्ध एक आत्मीय और अन्तरंग हस्तक्षेप के रूप में अंकित हैं। * * * भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन में ही उत्पन्न सांप्रदायिक राजनीति की शक्तियाँ गाँव को भी प्रभावित करते हैं। सती मैया के चौरा के लिए शुरू हुआ संघर्ष उन निहित स्वार्थों को निर्ममतापूर्वक उद्घाटित करता है जो धर्म और संप्रदाय के नाम पर लोक-चेतना और लोक-संस्कृति के प्रतीकों को नष्ट करते हैं। 'हिन्दू-मुसलमान की बात कभी अपने दिमाग में उठने ही न दो, यह समस्या धार्मिक नहीं राजनीति है और सही राजनीति ही सांप्रदायिकता का अन्त कर सकती हैं।' यह सही राजनीति क्या है? 'मैं कभी भी महत्त्वाकांक्षी नहीं रहा। धन, यश, प्रशंसा को कभी भी मैंने कोई महत्व नहीं दिया। पढ़ाई खत्म होने के बाद जो तकलीफ मैंने झेली, उसमें और आश्रम के जीवन में जो भी ग्रहण किया है, सच्चाई से किया है। आश्रम, जेल जीवन और पार्टी-जीवन ने मुझे बिलकुल सफेद कर दिया, सारी रंगीनियों को जला दिया...मैंने जीवन में जो भी ग्रहण किया है, सच्चाई से किया है। आश्रम में, जेल जीवन में, पार्टी-जीवन में और अब पत्रकारिता और लेखक के जीवन में...।' सती मैया का चौरा भैरवप्रसाद गुप्त का ही नहीं समूचे हिन्दी उपन्यास में एक उल्लेखनीय रचना के रूप में समादृत रहा है।

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    Bhairavprasad Gupt

    भैरवप्रसाद गुप्त

    जन्म : 7 जुलाई 1918 को सिवानकला गाँव (बलिया, उ॰प्र.) ।

    शिक्षा : इविंग कॉलेज, इलाहाबाद से स्नातक ।

    अपने शिक्षक की प्रेरणा से कहानी लेखन की ओर रुझान हुआ । जगदीशचन्द्र माथुर, शिवदान सिंह

    चौहान जैसे लेखकों एवं आलोचकों के सम्पर्क और साहित्यक-राजनीतिक परिवेश में उनके रचनात्मक संस्कारों को दिशा मिली ।

    सन् 1940 में मजदूर नेताओँ से सम्पर्क । सन् 1944 में माया प्रेस, इलाहाबाद है जुडे । अपने अन्य समकालीनों की तरह आर्य समाज और गाँधीवादी राजनीति की राह से बामपंथी राजनीति की ओर आये । सन 1948 में वे कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य बने ।

    प्रमुख प्रकाशित पुस्तकें : उपन्यास-शोले, मशाल, गंगा मैया, जंजीरें और नया आदमी, सत्ती मैया का चौरा, धरती, आशा, कालिन्दी, रम्भा, अंतिम अध्याय, नौजवान, एक जीनियस की प्रेमकथा, भाग्य देवता, अक्षरों के आगे (मास्टर जी) , 'छोटी-सी शुरुआत , कहानी संग्रह-मुहब्बत्त की राहें, फरिश्ता, बिगडे हुए दिमाग, इंसान, सितार के तार, बलिदान की कहानियाँ, मंजिल, महफिल, सपने का अंत, आँखों का

    सवाल, मंगली की टिकुली, आप क्या कर रहे हैं ? नाटक और एकांकी-कसौटी, चंदबरदाई, राजा का बाण । सम्पादित पत्रिकाएँ-माया, मनोहर कहानियाँ, कहानी, उपन्यास, नई कहानियाँ, समारंभ-1, प्रारंभ ।

    निधन: 5 अप्रैल, 3995

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