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Uttarkatha : Vol. 2

Uttarkatha : Vol. 2

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  • Pages: 532p
  • Year: 2011, 4th Ed.
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Lokbharti Prakashan
  • ISBN 13: 9788180310454
  •  
    'उत्तरकथ' के प्रथम खंड को पढ़ते हुए महसूस होता है कि जैसे लेखक, लूसिएँ गोल्डमान के उत्पत्तिमूलक संघटनात्मक समाजशास्त्र के सहारे पुराने मालवा के खौफनाक अँधेरे को एक विशिष्ट सामाजिक स्थिति में एक निश्चित वरण की अनिवार्यता का सामना करते हुए उभार रहा है और उजाले में समस्याओं की एक श्रृंखला प्रस्तुत करते हुए आलोचनात्मक चित्र और चरित्र उकेरते हुए सार्थक समाधान की सम्भावना तक आना चाहता है । सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह कि पूरा उपन्यास आध्यात्मिक सरोकारों से विच्छिन्न नहीं है । उपन्यास का नायक शिवशंकर आचार्य दुःख-भोग और दायित्व वहन के क्रम में-करुणा का अकलंक पुरुष है । ...त्रयम्बक और दुर्गा भारतीय दम्पति के शिवपार्वती - जैसे आदर्श हैं । शिवशंकर आचार्य, भारतीय मनीषा की चारित्रिक स्थिति का नाम है । यह चरित्र नहीं है । यह बीज-चरित्र को गोद लेकर वृक्षत्व प्रदान करते हैं...लेखक ने केवल कथा नहीं कही है, बल्कि...उनके बीच से चेतना के अनिवार्य नैरन्तर्य को तलाशा है...तभी तो यह केवल कथा नहीं है, उत्तरकालीन कथा नहीं है बल्कि प्रश्नों के समाधान की, उत्तर की भी कथा है । --श्री श्रीराम वर्मा : जनपक्ष

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    Shrinaresh Mehta

    श्रीनरेश मेहता

    जन्म: 15 फरवरी, 1922 को शाजापुर (मालवा) में हुआ।

    शिक्षा: आरम्भिक शिक्षा कई स्थानों पर हुई और बाद में माधव कॉलेज, उज्जैन से इण्टरमीडिएट किया। आपने काशी विश्वविद्यालय से हिन्दी में एम.ए. किया। यहाँ आप पर अपने गुरु श्री केशवप्रसाद मिश्र का गहरा प्रभाव पड़ा। श्री मिश्रजी वेद एवं उपनिषदों के ज्ञाता एवं प्रकाण्ड पंडित थे।

    गतिविधियाँ: उज्जैन में ही आप स्वाधीनता-आन्दोलन (1942) में छात्र-नेता के रूप में सक्रिय हुए। सन् 1948 से 53 तक आप आकाशवाणी के विभिन्न केन्द्रों पर कार्यक्रम अधिकारी रहे। 1955 तक आप वामपंथी राजनीति से भी सम्बद्ध रहे। विद्यार्थी-काल में वाराणसी से प्रकाशित दैनिक ‘आज’ और ‘संसार’ में कार्यरत रहे। सन् 1953 में सरकारी सेवा से मुक्त होकर कुछ समय के लिए गाँधी प्रतिष्ठान से जुड़े और तत्पश्चात् राष्ट्रीय मजदूर कांग्रेस के प्रमुख साप्ताहिक ‘भारतीय श्रमिक’ के प्रधान सम्पादक रहे। साथ ही ‘कृति’ एवं ‘आगामी कल’ जैसी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं का सम्पादन किया।

    पुरस्कार/सम्मान: म.प्र. शासन सम्मान, सारस्वत सम्मान, म.प्र. शासन शिखर सम्मान, उ.प्र. शासन संस्थान सम्मान। 1985 में हिन्दी साहित्य सम्मेलन का मंगला प्रसाद पारितोषिक, केन्द्रीय साहित्य अकादमी पुरस्कार, उ.प्र. शासन का सर्वोच्च ‘भारत भारती’ सम्मान, म.प्र. नाटक लोककला अकादमी द्वारा अलंकृत, म.प्र. हिन्दी साहित्य सम्मेलन का ‘भवभूति अलंकरण’, और सन् 1992 में भारतीय ज्ञानपीठ का सर्वोच्च साहित्य पुरस्कार।

    साहित्य सेवा: सन् 1959 से 85 तक आपने इलाहाबाद में रहकर स्वतन्त्र लेखन किया। 1985 से फरवरी, 1992 तक प्रेमचन्द सृजनपीठ के निदेशक रहे। प्रमुख दैनिक ‘चौथा संसार’ के प्रधान सम्पादक भी रहे। काव्य, खण्डकाव्य, उपन्यास, एकांकी, कहानी, निबन्ध, यात्रा-वृत्तांत आदि विधाओं में 40 से ज्यादा रचनाएँ प्रकाशित।

    निधन: 22 नवम्बर, 2000

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