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Gule Nagma

Gule Nagma

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  • Pages: 280p
  • Year: 2019
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Lokbharti Prakashan
  • ISBN 13: 9788180312847
  •  
    आने वाली नस्लें तुम पर रश्क करेगी हमअस्रो जब ये ध्यान आयेगा उनको, तुमने 'फ़िराक' को देखा था । 'फ़िराक' की शायरी इस धरती की सोंधी-सुगन्ध, नदियों की मदमाती चाल, हवाओं की नशे में डूबी मस्ती में ढूँढी जा सकती है । 'फ़िराक' प्रायः कहा करते थे कि कलाकार का मात्र भारतवासी होना पर्याप्त नहीं है, 'वरन उसके भीतर भारत को निवास करना चाहिए ! भारत की शायरी की पहचान भारतीयता से होना चाहिए ! भारतीयता का विशेष विशिष्ट काव्य प्रतिमान है । 'फ़िराक' की शायरी ने जीवन पर अमृत वर्षा कर दी और उसे ऐसी मधुर संगीत प्रदान की, जिससे देवताओं के पवित्र नेत्र भीग जायें । 'फ़िराक' की शायरी जीवन के लिए पाकीज़ा दुआ बन गयी । 'फ़िराक' ने उर्दू शायरी को एक बिलकुल नया आशिक दिया है और उसी तरह बिलकुल नया माशूक भी । इस नये आशिक की एक बड़ी स्पष्ट विशेषता यह है कि इसके भीतर एक ऐसी गम्भीरता पायी जाती है जो उर्दू शायरी में पहले नज़र नहीं आती थी । 'फ़िराक' के काव्य में मानवता की वही आधारभूमि है और उसी स्तर की है जैसे 'मीर' के यहाँ उनके काव्य में ऐसी तीव्र प्रबुद्धता है, जो उर्दू के किसी शायर से दब के नहीं रहती । अतएव, उनके आशिक में एक तरफ तो आत्मनिष्ठ मानव की गम्भीरता है, दूसरी तरफ़ प्रबुद्ध मानव की गरिमा है ।

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    Firaq Gorakhpuri

    ‘फि’राक’’ गोरखपुरी
    जन्म : 1896 ई–, गोरखपुर में ।
    कॉलेज में शिक्षा–प्राप्ति के दौरान ‘गोखले पदक’, ‘रानाडे पदक’, ‘सशादरी पदक’ से सम्मानित ।
    रचनारम्भ छात्रावस्था से ही ।
    सन् 1930 से 1958 तक इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अंग्रेजी साहित्य के अध्यापक ।
    सन् 1959 से 1962 तक विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के ‘रिसर्च प्रोफेसर’ ।
    सन् 1961 में ‘साहित्य अकादमी पुरस्कार’ ।
    सन् 1968 में ‘सोवियत–लैंड नेहरू पुरस्कार’ ।
    सन् 1968 में ही राष्ट्रपति द्वारा ‘पद्मभूषण’ उपाधि से विभूषित ।
    सन् 1970 में भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार द्वारा सम्मानित ।  
    1970 में साहित्य अकादेमी के सम्मानित सदस्य (फेलो) मनोनीत ।

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