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Bhartiya Lokparampara Mein Dohad

Bhartiya Lokparampara Mein Dohad

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  • Pages: 55p
  • Year: 1997
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Lokbharti Prakashan
  • ISBN 13: BLMD59
  •  
    प्राचीन भारतीय इतिहास, साहित्य एवं कला से ज्ञात होता है कि 'दोहद' 'ली एवं वृक्ष ' अभिप्राय (मोटिफ) का एक लोकप्रिय प्रकार था । संस्कृत कवियों, ग्रन्थकारों एवं कोशकारों की इस शब्द की व्याख्या के अनुसार यह वृक्ष-विशेष की अभिलाषा का द्योतक था, जो इसकी पूर्ति की अपेक्षा ली के क्रिया-विशेष से रखता था । प्रचलित लोकपरंपरा एवं सामान्य जन-अवधारणाओं को लक्ष्य में रखकर उन्होंने इसे ऐसे द्रव या द्रव्य का फूँक कहा है, जो वृक्ष, पौधों एवं लतादि में अकाल पुष्प-प्रसव की औषधि का कारक एवं शक्ति सिद्ध होता था । इनकी पृथक् आकांक्षाओं के रूप में प्रियंगु-दोहद, बकुलदोहद, अशोक-दोहद, कुरबक-दोहद, कर्णिकार-दोहद एवं नवनालिका-दोहद आदि शब्दों का प्रचुर संदर्भ भरतीय साहित्य की उल्लेखनीय विशेषता है । वृक्ष-दोहद (अभिलाषा) के समानार्थी प्रतीकात्मक उच्चित्रण विभित्र कालों के कला-केन्द्रों के शिल्पांकनों में द्रष्टव्य हैं । आप तित: गारिक अभिप्राय के बोधक वृक्ष-विषयक नाना दोहद-प्रकार कल्पित लगते हैं, पर विचारणीय है कि उनका निकट संबंध प्रचलित लोक-परंपरा एवं सामाजिक रीति-प्रथाओं से था जिनकी संपृक्तता नारी जनों का उद्यान, उपवन एवं वाटिकाओं के साथ प्रेम था । इसका प्रतिबिम्ब वैदिक साहित्य, महाभारत, रामायण, संस्कृत प्राकृत काव्यों, नाटकों, रीतिकालीन साहित्य एवं प्रचलित लोकगीतों में भी प्राप्य है । तत्संबंधी पाश्चात्य अवधारणाओं का परिशीलन तथा मिथक एवं यथार्थ को विश्लेषित करने वाले तत्वों की मीमांसा भी दोहद-विषयक इस अध्ययन का लक्ष्य रहा है । साथ ही प्रसंगत : अरण्य-संरक्षण एवं लोकमंगल की अन्तर्निहित भावना का अन्योन्य संबंध तथा निर्वनीकरण-प्रक्रिया एवं वृक्ष-तक्षण की भर्त्सना पर लाक्षाणिक ढंग से प्रकाश डालने वाले प्रस्तुत प्रबंध के विविध अध्यायों में सटीक चित्रों के सहित इस ललित कला-मुद्रा का विशद एवं एकत्र ऐतिहासिक परिचय रोचक एवं सारगर्भित भाषा में मुखरित हैं ।

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    Udai Narayan Rai

    डॉ. उदयनारायण राय

     जन्म : १९२८ ई., ग्राम बनकटा, जनपद-गोरखपुर।

    शिक्षा : प्रारम्भिक शिक्षा गोरखपुर से। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एम.ए. १९५१ ई. एवं डॉक्टर ऑफ फिलासफी  की  उपाधि  १९५७  ई.। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के ही इतिहास-विभाग तथा तदुपरान्त प्राचीन इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्त्व विभाग में क्रमानुसार लेक्चरर, रीडर, प्रोफेसर  एवं विभागाध्यक्ष। १९८९ ई. में अवकाश ग्रहण। 

    गतिविधियाँ : भारतीय इतिहास अनुसन्धान परिषद् के सीनियर रिसर्च फेलो, अगस्त १९८९ ई. से। १९९१ ई. प्राचीन इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्त्व विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय में प्रोफेसर इमेरिटस दिसंबर १९९१ से जून १९९३ ई.।

    पुरस्कार एवं सम्मानोपाधियाँ : मंगलाप्रसाद पारितोषिक, आचार्य नरेन्द्रदेव पुरस्कार, इमेरिटस फेलोशिप, विद्याभूषण सम्मान (उत्तर प्रदेश, हिन्दी संस्थान लखनऊ), साहित्यवाचस्पति (मानद डी.लिट्.), इलाहाबाद विश्वविद्यालय में लगभग ४० वर्षों तक अनुसन्धान-कार्य का पर्यवेक्षण, अनेक अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठियों में भाग एवं अध्यक्षता, शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक प्रसंगों में विदेशी राज्यों का पर्यटन—सोवियत भूमि (रूस), तुर्कमेनिस्तान (अश्काबाद), उज्बेकिस्तान (ताशकन्द), संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा, इंग्लैण्ड, वेल्स, प्रâांस। पिछले पाँच दशकों से हिन्दी सेवा, दस प्रकाशित ग्रन्थ, साठ से अधिक शोध-पत्र राष्ट्रीय एवं अन्तराष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित।

    निधन : १६ नवम्बर, २००७

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