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Kahanikar Premchand : Rachana Drishti Aur Rachana Shilp

Kahanikar Premchand : Rachana Drishti Aur Rachana Shilp

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  • Pages: 232p
  • Year: 2006
  • Binding:  Paperback
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Lokbharti Prakashan
  • ISBN 13: 9788180310795
  •  
    19वीं सदी का उत्तरार्द्ध हिन्दी साहित्य के आधुनिक काल का प्रस्थान-बिन्दु है । पं. रामचन्द्र शुक्ल ने हिन्दी साहित्य के इस आधुनिक काल को 'गद्य काल' की संज्ञा दी है । आधुनिक काल की दूसरी अनेक विशेषताओं के अलावा उसकी एक महत्वपूर्ण विशेषता आधुनिक काल में खड़ी बोली गद्य, गद्य-भाषा ओर गद्य-विधाओं का उदय और विकास है । 1 ९वीं सदी के उत्तरार्द्ध में विज्ञान के विकास तथा औद्योगिक प्रगति के साथ जब छापेखाने का आविष्कार हुआ, हिन्दी में समाचार-पत्रों तथा पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन प्रारम्भ हुआ 1 इन पत्र-पत्रिकाओं में ही सबसे पहले गद्य की कहानी, आलोचना, निबन्ध तथा रेखाचित्र जैसी विधाओं ने रूप पाया । अतएव कहा जा सकता है कि गद्य की दूसरी तमाम विधाओं के साथ, आज जिसे हम कहानी या लघु-कहानी के नाम से जानते है, वह अपने वर्तमान रूप में 1 वीं सदी के उत्तरार्द्ध की ही देन है । कहानी एक संक्षिप्त, कसावपूर्ण, कल्पना- विवरण है जिसमें एक प्रधान घटना अहोती है,र और एक पप्रमुखपात्र होता है । इसमें एक कथावस्तु होती हे जिसका विवरण इतना सूक्ष्म तथा निरूपण इतना संगठित होता है कि वह पाठकों पर एक निश्चित प्रभाव छोड़ता है । कहानी की प्राचीन परंपरा को महत्व देने के बावजूद आधुनिक कहानी के बारे में प्रेमचन्द का सुस्पष्ट मत हे कि उपन्यासों की तरह आख्यायिका की कला भी हमने पश्चिम से ली है, कम से कम इसका आज का विकसित रूप तो पश्चिम का है ही । ' 'सबसे उत्तम कहानी वह होती है जिसका आधार किसी मनोवैज्ञानिक सत्य पर हो ।.. .बुरा आदमी भी बिकुल बुरा नहीं होता । उसमें कहीं देवता अवश्य छिपा होता है, यह मनोवैज्ञानिक सत्य है । उस देवता को खोलकर दिखा देना सफल आख्यायिका लेखक का काम है । प्रेमचन्द अपनी कहानी-चर्चा को आगे बढ़ाते हुए उसमें समस्या प्रवेश को जरूरी मानते हैं । किसी समस्या का समावेश कहानी को आकर्षक बनाने का सबसे उत्तम साधन है ।

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    Shivkumar Mishra

    शिवकुमार मिश्र

    जन्म : 2 फरवरी 1931, कानपुर (उ.प्र.) !

    शिक्षा : एम्.एम्. तक की शिक्षा, कानपुर में ! पी.एच-डी. तथा डी. लिट्. सागर विश्वविद्यालय, सागर, म.प्र. से !

    गतिविधियाँ : सन 1959 से सन 1977 तक सागर विश्वविद्यालय में तथा उसके उपरांत 1991 ई. तक सरदार पटेल विश्वविद्यालय, वल्लभ विद्यानगर (गुजरात) में अध्यापन ! भारत सरकार की सांस्कृतिक आदान-प्रदान योजना के तहत 1991 ई. में 15 दिन की सोवियत यूनियन की सांस्कृतिक यात्रा ! राष्ट्रीय अध्यक्ष : जनवादी लेखक संघ !

    साहित्यिक सेवा : 'नया हिंदी काव्य', 'प्रगतिवाद', मार्क्सवादी साहित्य-चिंतन', 'यथार्थवाद', 'प्रेमचंद : विरासत का सवाल', आचार्य शुक्ल और हिंदी आलोचना की परंपरा', 'भक्ति आन्दोलन और भक्ति काव्य', 'मार्क्सवाद देव्मुर्तियाँ नहीं गढ़ता', 'आधुनिक कविता और युग-सन्दर्भ', 'इतिहास, साहित्य और संस्कृति'सहित साहित्य-समीक्षा से सम्बंधित 17 पुस्तकों का लेखन ! साहित्य समीक्षा से सम्बंधित आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी की चार पुस्तकों तथा विदेशी लेखकों की चार पुस्तकों का संपादन-पुनःप्रस्तुति !

    पुरस्कार : 'मार्क्सवादी साहित्य-चिंतन' पुस्तक पर सन 1975 ई. में सोवियत-लैंड नेहरु एवार्ड !

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