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Acharya Mahaveerprasad Dwivedi Ke Shreshth Nibandh

Acharya Mahaveerprasad Dwivedi Ke Shreshth Nibandh

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  • Pages: 319
  • Year: 2016, 1st Ed.
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Lokbharti Prakashan
  • ISBN 13: 9789352211715
  •  
    आज हम जो कुछ भी है उन्ही के बनाये हुए है | यदि पण्डित महावीरप्रसाद द्विवेदी न होते तो बेचारी हिंदी कोसों पीछे होती, समुन्नति की इस सीमा तक आने का अवसर ही नहीं मिलता | उन्होंने हमारे लिये पथ भी बनाया और पथ प्रदर्शक का भी काम किया | हमारे लिये उन्होंने वह तपस्या की है, जो हिंदी-साहित्य की दुनिया में बेजोड़ ही कही जायेगी | किसी ने हमारे लिये इतना नहीं किया जितना उन्होंने | वे हिंदी के सरल सुन्दर रूप के उन्नायक बने, हिंदी-साहित्य में विश्व-साहित्य के उत्तमोतम उपकरणों का उन्होंने समावेश किया, दर्जनों कवी, लेखक और संपादक बनाये | जिसमे कुछ प्रतिभा सेवा करायी | हिंदी के लिए उन्होंने अपना तन, मन, धन सब-कुछ अर्पित कर दिया | हमारी उपस्थित उपलब्धि उन्ही के त्याग का परिणाम है | - प्रेमचंद अंग्रेजी भाषा में जो स्थान डॉ. जॉनसन का है वर्तमान में वही स्था द्विवेदी जी का है | जिस प्रकार अंग्रेजी भाषा का वर्तमान स्वरुप बहुत दूर तक डॉ. जॉनसन का दिया हुआ है उसी प्रकार हिंदी का वर्तमान स्वरुप द्विवेदी जी का | - सेठ गोविन्द दास द्विवेदी जी ने समाजशास्त्र और इतिहास के बारे में जो कुछ लिखा है, उससे समाज विज्ञान और इतिहास लेखन के विज्ञानं की नवीन रूप-रेखायें निश्चित होती हैं | इसी दृष्टिकोण से उन्होंने भारत के सामाजिक और सांस्कृतिक विकास का नवीन मूल्याङ्कन किया | एक ओर उन्होंने इस देश के प्राचीन दर्शन, विज्ञान, साहित्य तथा संस्कृति के अन्य अंगो पर हमें गर्व करना सिखाया, एशिया के सांस्कृतिक मानचित्र में भारत के गौरवपूर्ण स्थान पर ध्यान केन्द्रित किया, दूसरी ओर उन्होंने सामाजिक कुरीतियों, धार्मिक रूढ़ियों का तीव्र खंडन किया और उस विवेक परम्परा का उल्लेख सहानुभूति पूर्वक किया जिसका सम्बन्ध चार्वाक और बृहस्पति से जोड़ा जाता है | अध्यात्मवादी मान्यताओं, धर्मशास्त्र की स्थापनाओं को उन्होंने नयी विवेक दृष्टि से परखना सिखाया | - रामविलास शर्मा उल्लेखनीय है कि, महावीरप्रसाद द्विवेदी की 'सरस्वती' ज्ञान की पत्रिका कही गयी है और उनका गद्य हिंदी साहित्य का ज्ञान कांड | इस प्रकार, भारत का उन्नीसवीं शताब्दी का नवजागरण यूरोप के 'एनलाइटेनमेंट' अथवा 'ज्ञानोदय' की चेतना के अधिक निटक प्रतीत होता है और पंद्रहवीं शताब्दी का नवजागरण 'रेनेसां' के तुल्य | - नामवर सिंह

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    Vinod Tiwari

    डॉ. विनोद तिवारी
    23 मार्च, 1973 को उत्तर प्रदेश के देवरिया में निम्म-मध्यवर्गीय परिवार में जन्म । प्रारम्भिक़ शिक्षा देवरिया में । इलाहाबाद विशवविद्यालय, इलाहाबाद से बी. ए., एम.ए. और डी.फिल. । दिल्ली विशवविद्यालय, दिल्ली के हिन्दी विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर । पूर्व में इलाहाबाद विश्वविद्यालय, इलाहाबाद, महात्मा गाँधी अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी विशवविद्यालय वर्धा, बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी में अध्यापन कार्य । दो वर्षों के लगभग अंकारा विश्वविद्यालय, अंकारा (तुर्की) में विजिटिंग प्रोफेसर । अब तक हैं 'परम्परा, सर्जन और उपन्यास' , 'नयी सदी की दहलीज पर' , 'विजयदेव नारायण साही' (साहित्य अकादमी के
    लिए विनिबन्ध) , 'निबन्ध : विचार - रचना' , 'आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के श्रेष्ठ निबन्ध' , 'आचार्य महाबीर प्रसाद द्विवेदी के श्रेष्ठ निब-ध' , 'उपन्यास : कला और सिद्धान्त - 1, 2' , 'कथालोचना : दृश्य-परिदृश्य' और 'नाजिम हिकमत के देश में जैसी
    पुस्तकों का लेखन और सम्पादन कर चुके हैं । महात्मा गांधी अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय वर्धा की पत्रिका 'बहुवचन' के दो अंकों का सम्पादन । हिन्दी जनक्षेत्र में बहुचर्चित और स्वीकृत पत्रिका 'पक्षधर' का सम्पादन-प्रकाशन कर रहे है । युवा आलोचना के लिए 'देवीशंकर अवस्थी आलोचना सम्मान - 2013' और 'वनमाली कथालोचना सम्मान- 2016' से सम्मानित ।
    सम्पर्क : हिन्दी विभाग, कला संकाय, उत्तरी परिसर, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली- 110 007
    (आवास) - C- 4/604 , आँलिव काउंटी, सेक्टर-5, वसुन्धरा, गाजियाबाद- 201 012

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