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Mahatirth Ke Kailasbaba

Mahatirth Ke Kailasbaba

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  • Pages: 284
  • Year: 2017, 1st Ed.
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Lokbharti Prakashan
  • ISBN 13: 9789352211920
  •  
    Digital Edition Available Instantly on Pajkamal Books Library on
    तिब्बत की रहस्यमयी भैरवी माताजी के निर्देश पर कैलासबाबा की खोज में मैं गया था चौरासी महासिद्ध श्मशान और फिर पार किया पाप-परीक्षा-पत्थर। पुण्यभूमि शिवस्थल, कैलासनाथ के चरण-कमल में बैठकर चित्ताकाश में पाया था नर्मदा नाम, किन्तु हाय, गँदले मन की स्थिरता के अभाव में उस महासत्य को न जान पाया! इशारा पाने के बावजूद आध्यात्मिक ज्ञान के अभाव में मन में आए उस आकस्मिक विचार को पकड़कर नहीं रख पाया। मेरी राय में ज्ञानगंज के एक भिखारी लामा ही ज्ञानीगुरु थे, जिन्होंने मुझे देखते ही मन्तव्य किया था कि मेरा मन ही है 'गँदला पानी'। शिवस्थल के स्थान माहात्म्य के प्रभाव में चित्ताकाश के नर्मदा नाम को मैं प्रश्रय न दे पाया। दरअसल सत्य को पकड़कर रखने की क्षमता मुझमें नहीं थी। इसके बाद देखते-देखते गुज़र गए दो साल। मैं भले ही भूल जाऊँ पर काल की पोथी में अंकित था मेरा प्राप्य। सन् 2009 में मिल गया 'दर्शन'—मिट गईं सारी इच्छाएँ। महातीर्थ के वही कैलासबाबा वर्तमान में परमपूज्य कायकल्पी बर्फानी दादाजी हैं। उन्हीं की कृपा से प्रकाशित हुई है यह पुस्तक 'महातीर्थ के कैलासबाबा'। —भूमिका से

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    Bimal De

    बिमल दे

    जन्म सन 1940, कोल्कता में ! बचपन से बंधनमुक्त होकर घर से भागकर बहुत बार हिमालय का चक्कर लगाया ! 1956 में जब तिब्बत का दरवाजा विदेशियों के लिये लगभग बंद हो चूका था, एक नेपाली तीर्थयात्री दल में शरीक होकर तमाम अडचनों से जूझता हुआ बिमल ल्हासा से कैलास तक की यात्रा कर आया !

    बिमल 1967 में साइकिल पर विश्व-भ्रमण के लिए निकला ! एक पुराणी साइकिल, जेब में कुल अठारह रूपये, मन में अदम्य उत्साह और साहस, यही उसकी पूँजी थी ! रस्ते में छिटपुट काम कर रोटी का जुगाड़ करगा, फिर आगे बढ़ता ! इस तरह पांच साल तक दुनिया की सैर करने के बाद वह 1972 में भारत लौटा ! इन यात्राओं का विवरण ‘दूर का प्यासा’ नामक ग्रन्थ में उसने 7 खंडो में लिखा ! बिमल सन 1972 से 1980 तक मुख्यतः पर्वतारोही पर्यटक के रूप में विश्व के पर्वतीय स्थलों की यात्रा करता रहा ! 1981 से 1998 के बीच उसने तीन बार उत्तरी ध्रुव और दो बार दक्षिणी ध्रुव की यात्रा की ! उसके अन्य ग्रन्थ हैं महातीर्थ के अंतिम यात्री व् सूर्य प्रणाम !

    फ्रांस की संस्थाओं ने तथा वाशिंगटन के नेशनल गेओग्रफिक सोसाइटी ने बिमल को कई बार सम्मानित किया है ! बिमल अमेरिकी पोलर सोसाइटी का आजीवन सदस्य है तथा ब्रितानवी पोलर सोसाइटी का परामर्शदाता भी ! अपने ढंग का अनूठा पर्यटक और दार्शनिक होने के साथ ही बिमल एक मानव प्रेमी है और वह निरंतर जनहितकार कार्यों में जुटा रहता है !

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