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Meerabai Ki Sampurna Padawali

Meerabai Ki Sampurna Padawali

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  • Pages: 153p
  • Year: 2013
  • Binding:  Paperback
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Lokbharti Prakashan
  • ISBN 13: 9788180317743
  •  
    भक्तिकाल में मीरां की ख्याति दूर-दूर तक फैल गयी थी । मीरा के विषय में अनेक किंवदन्तियाँ भी गढ़ ली गयीं । किंवदन्तियाँ भले ही ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित न हों किन्तु उनसे इतना अवश्य जाहिर होता है कि मीराँ अपनी विद्रोही चेतना के कारण लोकप्रिय अवश्य हो गयी थीं । जो रचनाकार जितना अधिक लोकप्रिय होता है उतना अधिक उसके कृतित्व का देशकाल के अनुसार रूपान्तरण होता है। मीरां के पद गेय थे अत: एक प्रान्त से दूसरे प्रान्त में साधु, सन्तों तथा गायकों के द्वारा मौखिक ढंग से प्रचारित- प्रसारित होते रहे। मीराँ सर्जनात्मक चेतना को भी उद्वेलित करती हैं। मीराँ के पदों में पाठ- भेद होने के लिए प्रादेशिक भेद तथा मौखिक गेय परम्परा को जिम्मेदार ठहराया गया है। उनके औचित्य पर प्रश्नचिह्न लगाये बिना एक सम्भावना से इनकार नहीं किया जा सकता है कि मीरां ने कुछ पदों को दुबारा कुछ विस्तार से तथा कुछ परिवर्तन के साथ गाया होगा । आत्मोल्लास या उन्माद के क्षणों में गाये जानेवाले गीतों में गायक को इसकी सुध-बुध कहाँ रहती है कि वह अपने पूर्व कथन को दुहरा रहा है । उन्होंने अपने जीवन में घटित हुए कटु एवं तीक्षा अनुभवों को वाणी दी है, राणा के द्वारा जो व्यवहार किया गया था, यदि मीरी भावावेश के क्षणो में उनका कई पदों में स्मरण करती हैं और भगवद् कृपा की महिमा का अनुभव करती हैं तो

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    Ramkishor Sharma

    प्रो. रामकोशोर शर्मा

    जन्म : 9-10-1949 को भैरोपुर, सुल्तानपुर (उत्तर प्रदेश में)

    शिक्षा : इलाहाबाद विश्वविद्यालय से, डी.फिल की उपाधि।

    गतिविधियाँ : 1979 से इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में कार्यरत, प्रवक्ता, उपाचाय (रीडर) आचार्य एवं अध्यक्ष पद का दायित्व सम्हालते हुए सम्प्रति सेवानिवृत, स्वतंत्र लेखन । अनेक शोध छात्रो एवं छात्राओं को डी.फिल उपाधि के लिए कुशल निर्देशन ।

    साहित्य-सेवा : निम्नलिखित पुस्तके प्रकाशित:

    अपभ्रंश मुक्तक काव्य और उसका हिन्दी पर प्रभाव, हिन्दी साहित्य का इतिहास, हिन्दी भाषा का विकास, आधुनिक भाषा विज्ञान के सिद्धान्त, भाषा विज्ञान, हिन्दी भाषा और लिपि, आधुनिक कवि, प्रेमचन्द की कहानियाँ : संवेदना और शिल्प, प्रयोजनमूलक हिन्दी, भाषा चिन्तन के नये आयाम, कबीरवाणी : कथ्य और शिल्प,

    गौरी (उपन्यास), हिन्दी साहित्य का समग्र इतिहास ।

    सम्पादन : सम्मेलन पत्रिका (यू.जी.सी. मान्य शोध पत्रिका)

    पद-प्रतिष्ठा : पूर्व प्रबन्ध मती, उपसभापति, भारतीय हिन्दी परिषद, इलाहाबाद, उपाध्यक्ष, साहित्यकार संसद, इलाहाबाद, साहित्य मंत्री-हिन्दी साहित्य सम्मेलन इलाहाबाद ।

    सम्मान : अक्षयवट, हिन्दुस्तानी अकादमी, नागरी प्रचारिणी सभा आदि संस्थाओं द्वारा सम्मानित । भारत के अनेक विश्वविद्यालयों, लोक सेवा आयोगों में शैक्षणिक एवं मूल्यांकन सम्बन्धी, कार्यों में सहयोग | लगभग 50 राष्ट्रीय, अन्तर्राट्रीय संगोष्ठियों में भागीदारी। अनेक पुरस्कार समितियों के निर्णायक मंडल के सदस्य ।

    सम्पर्क : 408-ए/15-जी, बक्शीखुर्द, प्रयागराज

    पिनकोड-211006 (उ.प्र.)

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