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Pragatisheel Sahitya Ki Jimmedari

Pragatisheel Sahitya Ki Jimmedari

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  • Pages: 136
  • Year: 2015
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Lokbharti Prakashan
  • ISBN 13: 9788180319976
  •  
    हिंदी साहित्य में मार्कंडेय की पहचान मुख्यतः कहानीकार के रूप में हैं ! २-डी, मिन्टोरोड़ से सीधे जुड़े रहे लोग भी उन्हें एक बेहतरीन किस्सागो के रूप में ही याद करते हैं ! लेकिन, देश और समाज-संस्कृति की लेकर उनकी चिंताएं व् जिम्मेदारी का भाव उन्हें कहानी से नित्बंध भी करता रहता और विचार-रूप में सीधे व्यक्त हो उठता ! यह पुस्तक मार्कंडेय की इस पहचान को सामने लाती है ! इस पुस्तक की अंतर्वस्तु का फैलाव साहित्य से लेकर राजनिति की हद तक है ! मार्कंडेय यहाँ जिस चिंतनधारा व् इतिहासबोध को अपनाते हैं वह आधुनिक समाज-विज्ञानों से आता तो है लेकिन अपने समाज की आंतरिक स्थिति, 'जन' तथा 'लोक' से अंतःक्रिया के साथ ! इस पुस्तक में वैचारिक लेखों के आलावा 'गोदान' तथा अन्य ग्राम-उपन्यासों पर लिखे लेख तथा पुस्तक समीक्षाएं भी शामिल हैं ! लोक-साहित्य पर डॉ लेख और डॉ भाव-चित्र हैं जो आधुमिक और प्रगतिशील दृष्टि को ही अपना प्रस्थान-बिंदु बनाते हैं ! इस पुस्तक में मार्कंडेय सर्वथा भिन्न रूप में पाठकों से रू-ब-रू होंगे ! मार्कंडेय के साहित्य-संवाद का यह संस्करण 'प्रगतिशील साहित्य की जिम्मेदारी' पर खरा उतरता है !

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    Markandey

    2 मई, 1930 में बराई गाँव-जिला जौनपुर में जन्में मार्कण्डेय की प्राथमिक शिक्षा गॉव में, आगे  की पढाई प्रतापगढ़ से उच्च शिक्षा इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अर्जित किया ।

    मार्कण्डेय स्वाधीन भारत के कथाकार थे, लेकिन वे गहरे अर्थों में भारतीय सामाजिक चेतना के भी कथाकार रहे है । उन्होंने अपनी कहानी का आरम्भ वहीं से किया जहॉ प्रेमचन्द ने कहानी को छोडा था। प्रेमचन्द की ही तरह मार्कण्डेय भी मूलत: देशज संवेदना के कथाकार थे । प्रेमचन्द की परम्परा से मार्कण्डेय का रिश्ता महज ग्रामीण यथार्थ का ही न होकर उस समूचे सामा-जिल ताने- बाने का भी था जिसके बिना न तो किसी

    पारम्परिक समाज को समझा जा सकता है और न उसके आगत क्री आहटें सुनी जा सकती है । मार्कण्डेय देश के राजनीतिक जनतंत्र का उत्सवीकरण करने के बजाय अपनी कहानियों में उसका सामाजिक और

    आर्थिक क्रिटीक रचते है ।

    कहानियों के अलावा तो उपन्यास 'सेमल के फूल' तथा ‘अग्निबीज’ एकांकी-संग्रह "पत्थर व परछाइयाँ, काव्य-संभ्रह 'सपने तुम्हारे थे' तथा ‘यह पृथ्वी तुम्हें देता हूँ’,  आलोचना ‘कहानी की बात’, ‘नयी कहानी : यथार्थवादी नजरिया, प्रगतिशील साहित्य की जिम्मेदारी, साहित्य संवाद कल्पना में चक्रधर नाम से लिखा गया स्तम्भ ‘चक्रधर की साहित्यकार' नाम से प्रकाशित ।

    निधन : 18 मार्च, 2010 ।

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