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Prapanch Padi

Prapanch Padi

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  • Pages: 108p
  • Year: 2007
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Lokbharti Prakashan
  • ISBN 13: 9788180311567
  •  
    ज्ञानपीठ द्वारा पुरस्कृत तथा पर्भिंूषण, कलाप्रपूर्ण आदि उपाधियों से सम्मानित डॉ. सी. नारायण रेड्डी तेलुगु के जाने-माने कवि, गीतकार और समालोचक हैं। यों कहें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि तेलुगु साहित्य की प्रत्येक विधा को डॉ. रेड्डी ने अपने अमृत-स्पर्श से जीवन्त बना दिया। साहित्य स्रष्टा होने के साथ-साथ वे कुशल प्रशासक भी हैं। अपने दैनिक जीवन में अपनी हास्यप्रियता और वाक्चातुर्य के कारण वे अपने परिवेश को सदा जीवन्त बनाए रखते हैं। ‘मंथन’, ‘भूमिका’, ‘विश्वंभरा’ आदि काव्यों में मानव के विकास के इतिहास को सुगम रूप से प्रस्तुत करने के बाद उन्होंने अनेक छोटी-मोटी कविताएँ लिखते हुए भी एक विनूतन शैली में 108 प्रपंच-पदियों की रचना की है। ये प्रपंच-पदी उर्दू की रुबाई शैली में लिखे गए हैं। रुबाई में चार चरण होते हैं, जिनमें पहले, दूसरे और चौथे में तुक मिलाया जाता है। रेड्डी जी ने रूबाई में एक और चरण जोड़कर उसे पंच-पदी (पाँच चरणोंवाला) बनाया है और संसार की रीति-नीतियों के चित्रण के कारण इन्हें ‘प्रपंच-पदी’ कहा है। प्रपंच-पदियों की रचना में डॉ. रेड्डी ने तेलुगु भाषा में प्रचलित चतुरश्र और मिश्र गतियों का प्रयोग किया है। इनके प्रयोग से काव्य-रचना प्रभावशाली बन गई है। प्रपंच-पदियों की फलश्रुति में डॉ. रेड्डी ने इन पदों के उद्देश्य को स्पष्ट किया है। ये टूटे जन-मन में उत्साह भरनेवाले, सुप्त नीतियों को प्रकाश में लानेवाले, निद्रित चरणों को जागृत करनेवाले और वर्तमान में परिवर्तन लाने के प्रयास के परिणाम हैं। जीवन में कड़वे और मीठे सत्यों को मथकर डॉ. रेड्डी ने इन 108 प्रपंच- पदियों की रचना की है। तेलुगु में लब्धप्रतिष्ठ डॉ. नारायण रेड्डी आजकल हिन्दी और उर्दू में भी मौलिक रूप से ग़ज़लों की रचना कर रहे हैं। उनकी इस विशिष्ट रचना-प्रक्रिया और ‘प्रपंच-पदियों’ का हिन्दी जगत में स्वागत होगा, ऐसा हमारा विश्वास है। - प्रोफेसर भीमसेन निर्मल

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    Dr. C. Narayan Reddy

    हनुमजिपेटा ग्राम (जिला करीमनगर), आन्ध्र प्रदेश में 29 जुलाई, 1931 को जनमे रेड्डी जी उस्मानिया यूनिवर्सिटी, हैदराबाद से एम.ए., पी-एच.डी. हैं। आपका शोध-प्रबंध ‘आधुनिक आन्ध्र कविता में परम्परा और प्रयोग’ पर था।

    आपको 1976 में मेरठ विश्वविद्यालय से मानद ‘डी.लिट्.’; 1977 में ‘पद्मश्री’; 1978 में आन्ध्र विश्वविद्यालय, वाल्टेअर से ‘कलापूर्ण’ उपाधियाँ प्राप्त हुई हैं।

    पुरस्कार:

    ‘ऋतुचक्रम’ को आन्ध्र प्रदेश साहित्य अकादेमी पुरस्कार। ‘मंटलु-मानवुडु’ साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली से पुरस्कृत। ‘विश्वंभरा’ को कुमारन आशान, सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार तथा भीलवाड़ा पुरस्कार।

    अनेक महत्त्वपूर्ण पुस्तकों के रचयिता।

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