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Samay Ke Sulagte Sarokar : Media, Samay Aur Samaaj Par Prashnchinha

Samay Ke Sulagte Sarokar : Media, Samay Aur Samaaj Par Prashnchinha

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Special Price Rs. 356

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  • Pages: 199p
  • Year: 2019, 1st Ed.
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Lokbharti Prakashan
  • ISBN 13: 9789389243260
  •  
    महात्मा बुद्ध ने कहा है---प्रश्न करो । हर स्थिति पर प्रश्न करो । परंतु, आज व्यवस्था ने प्रश्न करने को अपराध करार कर दिया है । ऐसे बंधनकारी युग में जीवित रहने के लिए प्रश्न करने को जरुरी मानते है प्रो. सेवाराम त्रिपाठी । उनके अनुसार प्रश्न करना ही संसार और समाज की बेहतरी का मूलमंत्र है । समय, समाज और युग की प्रश्नाकुल शिनाख्त करते उनके वैचारिक लेखों की पुस्तक है--- ‘समय के सुलगते सरोकार ।’ सेवाराम त्रिपाठी जी के इस निबंध-संकलन में उनका समय प्रतिबिंबित ही नहीं, परिभाषित भी हुआ है । निरंतर और तेजी से बदल रहे समाज, राजनीति और सांस्कृतिक हलचलों को अनेक पक्षों से देखने के बाद एक सुचिंतित पड़ताल यहाँ सहज ही देखि जा सकती है । इस सहजता के पीछे एक सुदीर्घ चिंतन-परंपरा और गंभीर विचार-प्रणाली का ठोस आधार है । व्यापक विस्तार वाले इन निबंधों में एक समाजशारत्री की चेतना और एक गंभीर अध्येता का विवेक उपस्थित हैं । विवाह-संस्था, सामाजिक-पारिवारिक संबंध, लोकतंत्र के वातावरण में हो रहे कठिन बदलाव, शोषण का व्यापक होता दायरा, पर्यावरण की बदहाली, सामर्थ्यवान युवाओं और शक्तिमान मीडिया की सामजिक भूमिका, लोकतंत्र के वर्तमान और भविष्य को समझने-समझाने की यहॉ आवश्यक कोशिश की गई हें । वृद्ध होते लोगों और आधी दुनिया यानी औरतों की सामाजिक हैसियत की इतनी गहरी समीक्षा अन्यत्र दुर्लभ है । हम साफ़ देख सकते है कि लडखडाते लोकतंत्र की हर बारीक डगमगाहट इन लेखों में अंकित है । इन्हीं बारीकियों और यथार्थ को नए दृष्टिकोण से देखने के कारण ये लेख एक स्थायी दस्तावेज का रूप ले लेते है । किताब का शीर्षक 'समय के सुलगते सरोकार' अपनी सार्थकता इस तरह सिद्ध करता है कि इससे समय को देखने और उसमें सार्थक बदलाव लाने की एक चाबी मिलती है; साथ ही खुद को परखने की एक कसौटी भी । मुझे भरोसा है कि प्रस्तुत निबंध रास्ता देखते हुए, बोलते-बतियाते हुए देर तक और दूर तक मनुष्य को उसके सरोकारों की याद दिलाएँगे । - बोधिसत्व

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    Sewaram Tripathi

    सेवाराम त्रिपाठी

    22 जुलाई 1951 को ग्राम जमुनिहाई, जिला सतना (मध्यप्रदेश) में जन्म ।

    1972 से 2016 तक मध्य प्रदेश शासन उच्च शिक्षा विमाग में प्राध्यापक के रूप में कार्य ।

    दो वर्ष तक मध्य प्रदेश हिन्दी ग्रंथ अकादमी, गोपाल में संचालक और संयुक्त संचालक के दायित्वों का निर्वहन ।

    1970 से कविताएँ लिख रहे है । पहला कविता-संग्रह ‘अँधेरे के खिलाफ़' 1983 में और दूसरा ‘खुशबू बॉटतीं हवा' 2016 में प्रकाशित । बघेली लोक-स्राहित्य और संस्कृति पर केद्रित पुस्तक ‘बघेली : अंतरंग अंतर बहिरंग' 2016 में प्रकाशित ।

    'वसुधा' के बीस से अधिक अंकों में सह संपादक तथा दस से अधिक पुस्तकों के संपादन-मंडल में ।

    कविताओं के साथ आलोचना के क्षेत्र में कार्य । ‘मुक्तिबोध : संर्जक और विचारक' पुस्तक 2001 में प्रकाशित तथा मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी, भोपाल के आचार्य नंददुलारे वाजपेयी पुरस्कार से सम्मानित । आलोचनात्मक-वैचारिक निबंधों की पुस्तक ‘हर समय एक सपना जागता है' तथा समय, समाज और मीडिया पर केंद्रित पुस्तक ‘समय के सुलगते सरोकार' 2019 में प्रकाशित ।

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