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Shabri

Shabri

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  • Pages: 61p
  • Year: 2012, 1st Ed
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Lokbharti Prakashan
  • ISBN 13: 9788180316760
  •  
    'शबरी' में कवि आधुनिकता के अधिक पास होते हैं ! उन्होंने लिखा है--'वाल्मीकि ने सामाजिक वर्ण-व्यवस्था से ऊपर व्यक्ति के आध्यात्मिक स्वत्व एवं असंग कर्म को प्रतिष्ठापित किया और शबरी वही बीज चरित्र है ! चरित्र की दृष्टि से शबरी मन्त्र चरित्र लगती है'--अपनी छोटी-सी उपस्थिति में सार-भूत ! शबरी काव्य विचारों की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है ! एक दलित स्त्री को अपने कर्म-श्रम के जरिये ऊपर उठाकर ऋषि मतंग जिस भूमि पर प्रतिष्ठित करते हैं, उससे पौराणिकता की रक्षा भी होती है और वर्ण-व्यवस्था के विरुद्ध उठती आज की आवाज को भी बल मिलता है !

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    Shrinaresh Mehta

    श्रीनरेश मेहता

    जन्म: 15 फरवरी, 1922 को शाजापुर (मालवा) में हुआ।

    शिक्षा: आरम्भिक शिक्षा कई स्थानों पर हुई और बाद में माधव कॉलेज, उज्जैन से इण्टरमीडिएट किया। आपने काशी विश्वविद्यालय से हिन्दी में एम.ए. किया। यहाँ आप पर अपने गुरु श्री केशवप्रसाद मिश्र का गहरा प्रभाव पड़ा। श्री मिश्रजी वेद एवं उपनिषदों के ज्ञाता एवं प्रकाण्ड पंडित थे।

    गतिविधियाँ: उज्जैन में ही आप स्वाधीनता-आन्दोलन (1942) में छात्र-नेता के रूप में सक्रिय हुए। सन् 1948 से 53 तक आप आकाशवाणी के विभिन्न केन्द्रों पर कार्यक्रम अधिकारी रहे। 1955 तक आप वामपंथी राजनीति से भी सम्बद्ध रहे। विद्यार्थी-काल में वाराणसी से प्रकाशित दैनिक ‘आज’ और ‘संसार’ में कार्यरत रहे। सन् 1953 में सरकारी सेवा से मुक्त होकर कुछ समय के लिए गाँधी प्रतिष्ठान से जुड़े और तत्पश्चात् राष्ट्रीय मजदूर कांग्रेस के प्रमुख साप्ताहिक ‘भारतीय श्रमिक’ के प्रधान सम्पादक रहे। साथ ही ‘कृति’ एवं ‘आगामी कल’ जैसी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं का सम्पादन किया।

    पुरस्कार/सम्मान: म.प्र. शासन सम्मान, सारस्वत सम्मान, म.प्र. शासन शिखर सम्मान, उ.प्र. शासन संस्थान सम्मान। 1985 में हिन्दी साहित्य सम्मेलन का मंगला प्रसाद पारितोषिक, केन्द्रीय साहित्य अकादमी पुरस्कार, उ.प्र. शासन का सर्वोच्च ‘भारत भारती’ सम्मान, म.प्र. नाटक लोककला अकादमी द्वारा अलंकृत, म.प्र. हिन्दी साहित्य सम्मेलन का ‘भवभूति अलंकरण’, और सन् 1992 में भारतीय ज्ञानपीठ का सर्वोच्च साहित्य पुरस्कार।

    साहित्य सेवा: सन् 1959 से 85 तक आपने इलाहाबाद में रहकर स्वतन्त्र लेखन किया। 1985 से फरवरी, 1992 तक प्रेमचन्द सृजनपीठ के निदेशक रहे। प्रमुख दैनिक ‘चौथा संसार’ के प्रधान सम्पादक भी रहे। काव्य, खण्डकाव्य, उपन्यास, एकांकी, कहानी, निबन्ध, यात्रा-वृत्तांत आदि विधाओं में 40 से ज्यादा रचनाएँ प्रकाशित।

    निधन: 22 नवम्बर, 2000

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