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Tripur Sundari

Tripur Sundari

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  • Pages: 128p
  • Year: 2007
  • Binding:  Paperback
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Lokbharti Prakashan
  • ISBN 13: 9788180311932
  •  
    एक दिन नहा-धोकर जब उसने आईना देखा था, तब उसके मन का सारा अवसाद तिरोहित हो गया था ! अपने रूप पर वह स्वयं ही मुग्ध हो उठी थी और भावावेश में उसने आईने को चूम लिया था ! उसी दिन उसने तय कर लिया था कि वह विवेक से हार नहीं मानेगी-किसी से भी हार नहीं मानेगी ! उसी रात उसने स्वप्न में बाबा को देखा था ! वह मुस्कुराकर कह रहे थे -- 'तुम्हारी शक्ति तुम्हारे अपने आप पर नियंत्रण रखने में है ! इस नियंत्रण को रख सको तो तुम त्रिपुर सुंदरी हो ! न रख सको तो तुम अपने आपको केवल नारी पाओगी ! तुम्हारी सुखद गोद में लेटते समय मैंने गुम्हे त्रिपुर सुंदरी के रूप में देखा था और तुम त्रिपुर सुंदरी ही थीं ! पर अब तुम उस घटना को नारी बनकर सोच रही हो, यह उचित नहीं है ! संसार में केवल माँ बनकर रहो ! इसी में तुम्हारा कल्याण है !"

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    R. Sh. Kelkar

    R. Sh. Kelar

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