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Tum Mera Moun Ho

Tum Mera Moun Ho

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  • Pages: 100p
  • Year: 1993
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Lokbharti Prakashan
  • ISBN 13: TMMH341
  •  
    इमान्यधिक मग्नानि पदानि बहतो वधूम्। गोप्य: पश्यत कृष्णस्य भाराक्रान्तस्य कामिन:।। अत्रावरोपिता कान्ता पुष्पहेतोर्महात्मना अत्र प्रसूनावचय: प्रियार्थे प्रेयसा कृत:। प्रपदाक्रमणे एते पश्यता सकले पदे।। केशप्रसाधनं त्वत्र कामिन्या: कामिना कृतम्। तानि चूडयता कान्तामुपविष्ट मिह ध्रुवम्।। रेमे तया चात्मरत् आत्मारामोप्य खण्डित:। कामिनां दर्शयन् दन्यं स्त्रीणा चैव दुरात्मनाम्।। —श्रीमद्भागवत : दशम स्कन्द भाव एवं प्रसंग : किसी एक गोपी को लेकर श्रीकृष्ण एकान्त में चले गये हैं, शेष गोपिकाएँ उन्हें ढूँढ रही हैं। वन-मार्ग में प्रिय के पैरों की छाप कहीं हल्की तो कहीं गहरी दिखलाई देती है। एक स्थान पर फूल बिखरे हैं। वे सब निष्कर्ष निकालती है कि प्रिय ने जहाँ उस गोपी को उठा रख्खा होगा वहाँ पद-छाप गहरी है, जहाँ उसके केश-प्रसाधन के लिए फूल चुने वहाँ फूल बिखरे हुए हैं। परन्तु भागवतकार का कथन है कि ऐसा लीला-पुरुष तो पूर्ण-पुरुष है। उससे अन्यत्र न कोई गोपिका है और न ही कोई काम-भाव। वह आत्मतुष्ट—व्यक्त रूप में आशक्त है और अव्यक्त में अनासक्त।

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    Shrinaresh Mehta

    श्रीनरेश मेहता

    जन्म: 15 फरवरी, 1922 को शाजापुर (मालवा) में हुआ।

    शिक्षा: आरम्भिक शिक्षा कई स्थानों पर हुई और बाद में माधव कॉलेज, उज्जैन से इण्टरमीडिएट किया। आपने काशी विश्वविद्यालय से हिन्दी में एम.ए. किया। यहाँ आप पर अपने गुरु श्री केशवप्रसाद मिश्र का गहरा प्रभाव पड़ा। श्री मिश्रजी वेद एवं उपनिषदों के ज्ञाता एवं प्रकाण्ड पंडित थे।

    गतिविधियाँ: उज्जैन में ही आप स्वाधीनता-आन्दोलन (1942) में छात्र-नेता के रूप में सक्रिय हुए। सन् 1948 से 53 तक आप आकाशवाणी के विभिन्न केन्द्रों पर कार्यक्रम अधिकारी रहे। 1955 तक आप वामपंथी राजनीति से भी सम्बद्ध रहे। विद्यार्थी-काल में वाराणसी से प्रकाशित दैनिक ‘आज’ और ‘संसार’ में कार्यरत रहे। सन् 1953 में सरकारी सेवा से मुक्त होकर कुछ समय के लिए गाँधी प्रतिष्ठान से जुड़े और तत्पश्चात् राष्ट्रीय मजदूर कांग्रेस के प्रमुख साप्ताहिक ‘भारतीय श्रमिक’ के प्रधान सम्पादक रहे। साथ ही ‘कृति’ एवं ‘आगामी कल’ जैसी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं का सम्पादन किया।

    पुरस्कार/सम्मान: म.प्र. शासन सम्मान, सारस्वत सम्मान, म.प्र. शासन शिखर सम्मान, उ.प्र. शासन संस्थान सम्मान। 1985 में हिन्दी साहित्य सम्मेलन का मंगला प्रसाद पारितोषिक, केन्द्रीय साहित्य अकादमी पुरस्कार, उ.प्र. शासन का सर्वोच्च ‘भारत भारती’ सम्मान, म.प्र. नाटक लोककला अकादमी द्वारा अलंकृत, म.प्र. हिन्दी साहित्य सम्मेलन का ‘भवभूति अलंकरण’, और सन् 1992 में भारतीय ज्ञानपीठ का सर्वोच्च साहित्य पुरस्कार।

    साहित्य सेवा: सन् 1959 से 85 तक आपने इलाहाबाद में रहकर स्वतन्त्र लेखन किया। 1985 से फरवरी, 1992 तक प्रेमचन्द सृजनपीठ के निदेशक रहे। प्रमुख दैनिक ‘चौथा संसार’ के प्रधान सम्पादक भी रहे। काव्य, खण्डकाव्य, उपन्यास, एकांकी, कहानी, निबन्ध, यात्रा-वृत्तांत आदि विधाओं में 40 से ज्यादा रचनाएँ प्रकाशित।

    निधन: 22 नवम्बर, 2000

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