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Urdu Sahitya Ka Alochnatmak Ithas

Urdu Sahitya Ka Alochnatmak Ithas

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  • Pages: 288p
  • Year: 2008
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Lokbharti Prakashan
  • ISBN 13: 9788180313233
  •  
    इस ग्रन्थ के विद्वान लेखक प्रोफेसर एहतेशाम हुसैन उर्दू के मान्य आलोचक हैं । यह पुस्तक मूल रूप से हिन्दी में ही लिखी गयी थी और अब यह एक सर्वमान्य तथ्य है कि इससे अच्छा उर्दू साहित्य का कोई दूसरा इतिहास न तो हिन्दी में उपलब्ध है ओर न ही उर्दू में । उर्दू साहित्य के अब तक जो इतिहास लिखे गये हैं, उनमें यह कमी रही है कि लेखकों ने सामाजिक चेतना और ऐतिहासिक समग्रता को अपनी दृष्टि में नहीं रखा है; कुछ भाषा सम्बन्धी विभिन्नताओं और शैलियों के भेदोपभेदों को सामने रखकर काल- विभाजन कर दिया है । इससे उर्दू साहित्य से सम्पूर्ण इतिहास के विकास और उसकी विभिन्न विधाओं की प्रगति का ठीक-ठीक ज्ञान नहीं हो पाता है । प्रस्तुत पुस्तक में चेष्टा की गयी है कि उर्दू-साहित्य की जो रूपरेखा दी जाये, वह इस बात का सही-साफ परिचय दे सके कि कौन-सी ऐसी ऐतिहासिक परिस्थितियाँ थीं, जिनमें साहित्यिक विकास तथा परिवर्तन का क्रम निरन्तर गतिशील रहा और उसने भारतीय भाषाओं के साहित्य में उर्दू-साहित्य की महान् परम्परा को विकसित और समृद्ध किया । चूँकि उर्दू-साहित्य के इतिहास का हिन्दी साहित्य के इतिहास से अविच्छिन्न सम्बन्ध है, इसलिए यह निश्चित ही है कि यह पुस्तक हिन्दी के उच्च कक्षा के विद्यार्थियों, जिज्ञासु पाठकों, सुधि आलोचकों तथा शोधकर्ताओं के लिए अत्यन्त उपयोगी है ।

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    Ehtesham Hussain


    प्रो. एहतेशाम हुसैन
    उर्दू के प्रख्यात साहित्यकार व आलोचक एहतेशाम हुसैन  11 जुलाई, 1912 को आजमगढ़ के माहुल गाँव में पैदा हुए । प्रारम्भिक शिक्षा घर पर हुई । बेलजली स्कूल से हाई स्कूल किया । बीए, व एम.ए. की शिक्षा इलाहाबाद युनिवर्सिटी से पूरी की । एम.ए. करते ही जुलाई 1938 से उर्दू विभाग लखनऊ युनिवर्सिटी में पढ़ाने लगे । शुरू से ही प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े होने के कारण मार्क्सवादी चिन्तन उनके लेखों में मिलने लगा । गालिब, प्रेमचन्द, इकबाल आदि पर उनके लेख चर्चा में आने लगे और उनकी पुस्तकें ' 'तनकीदी जायज़े' ', ' 'अदब और समाज' ', ' 'अक़बारों-मसायल' ' आदि ने अपनी पहचान बनाई । 1961 ई. में प्रोफेसर के पद पर वह इलाहाबाद युनिवर्सिटी आ गये । 1972 तक इस पद पर रहे । 1 दिसम्बर 1972 में दिल के दौरे से उनकी अकस्मिक मृत्यु हो गई । यूँ तो एहतेशाम हुसैन ने शायरी की कहानियाँ भी लिखीं- सफरनामा भी, लेकिन अरल व अहम पहचान एक प्रगतिशील मार्क्सवादी आलोचक की ऐसी बनी कि बाक्री सब पीछे रह गये । साहित्य का समाज से रिश्ता जोड़ते हुए उसे इतिहास और जमाने के टकराव के परिपेक्ष में देखना एहतेशाम हुसैन का बुनियादी कारनामा था । साहित्य को एक बड़े और फैले हुए दायरे में देखने व समझने की यह पहली और बड़ी कोशिश थी जिससे पूरी नस्ल प्रभावित हुई और एहतेशाम हुसैन केवल एक व्यक्ति या आलोचक ही नहीं बल्कि प्रगतिशील आलोचना की धरोहर बन गये जिस पर पूरा एक काफिला चल पड़ा उनकी पुस्तकें  ' 'तनक्रीद और अमली तनकीद' ', ' 'जौके-अदब और शऊर' ', '' अक्स और आइने' ' और चकबस्त, अकबर, सज्जाद जहीर आदि पर लिखे गये उनके लेख उर्दू आलोचना की क़ीमती व रौशन मिसालें हैं जिनके कारण एहतेशाम हुसैन उर्दू आलोचना का कभी न भुलाया जाने वाला अध्याय बन गये । उन्होंने कुछ काम हिन्दी व अंग्रेजी में भी किये । ' 'उर्दू साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास' ' एक ऐसी किताब है जो पूरे हिन्दी साहित्य में लोकप्रिय है ।

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